20 मई 2011

कुरआन या कोई धर्म माँस खाने को नहीं कहता ।

ब्लागिंग में मुझसे कई बार यह सवाल किया गया । जीव हत्या द्वारा प्राप्त माँस खाना उचित है । या अनुचित ? ये तो खैर एक अलग ही बात थी । सबसे खास चौंकाने वाली बात लोगों ने कही कि तमाम धर्मगृंथ कुरआन हिन्दू शास्त्र आदि भी माँस खाने को उचित बताते हैं ? ऐसा ही जिक्र सन्त मंडली के बीच भी अक्सर हो जाता है ।
सन्तमत ने आहार क्या है ? और क्या अभक्ष्य है ? इस पर दो टूक बात कही है
स्वांस स्वांस का करो विचारा । बिना स्वांस का करो आहारा ।
सीधी सी बात है । जिसकी स्वांस का आवागमन होता है । वह जीव है । और उसको मारना पाप ही है । अर्थात इस भक्ष्य अभक्ष्य निर्णय हेतु स्वांस को आधार माना गया है ।
खैर..अब आईये देखते हैं कि धर्म पुस्तकें माँस खाने की बात कहती हैं या नहीं ?
इस लेख को लिखने से पहले मैं वो कलमा काफ़ी देर तक खोजता रहा । जो मुसलमान कुरबानी से पहले बोलते हैं । लेकिन अफ़सोस मेरे कंप्यूटर में सेव होने के बाद भी वो मुझे नहीं मिल पाया ।


खैर..परन्तु उसका मतलब ये है कि - हे अल्लाह ! ये ( जानवर ? ) तुमने ही मुझे दिया था । और अब ( कुरवानी द्वारा ) इसे तुम्हें ही दे रहा हूँ ।
कमाल है । कितने बङे महावाक्य को अपने पेट भरने की खातिर । इतने बङे झूठ में बदल दिया गया । और इस वाक्य में किसी भी जानवर.. या उसकी हत्या का नाममात्र भी इशारा तक नहीं है । इस तरह कोष्ठक में शब्द मनमाने ढंग से जोङे गये हैं ।
हिन्दुओं ! आप भी ध्यान दो - हे अल्लाह ! ये तुमने ही मुझे दिया था । और अब इसे तुम्हें ही दे रहा हूँ ।
आप लोग इस बात को इस तरह कहते हो - तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा ?
अर्थात - हे प्रभु ! हम तो यहाँ खाली हाथ आये थे । तन पर एक लंगोट भी नहीं था । जो कुछ भी हमने प्राप्त किया । सब तेरी ही कृपा से । अतः हम ये सब कुछ । जिसे अग्यानवश अपना मान बैठे थे । तुझे अर्पण करते हैं । ये है । असली कुरवानी । खुद का अहम मारना । खुद की खुदी मिटाना । इसको कुरवानी कहते हैं ।
गहरायी से सोचें । तो कृष्ण ने गीता में इसी निष्काम कर्म की प्रसंशा की है ।


कुरबानी या बलि का मतलब हत्या हरगिज नहीं हैं - गौर से विचार करिये । इन शब्दों पर ।
वह अपने देश के लिये कुरवान हो गया । या 4 शहीदों ने कुरवानी दी । उस माँ ने बेटे की खुशियों की खातिर अपनी इच्छाओं का बलिदान कर दिया । उस बेचारे ( या बेचारी ) के अरमानों की बलि चढ गयी । ऐसे गुरु पर बलि बलि जाऊँ । अर्थात अपना सब कुछ निछावर कर दूं । प्यार में कुरवानी देनी होती है । यानी विभिन्न रूपों में इसका मोल चुकाना होता है ..आदि आदि ये वाक्य हजारों तरह से हमारी जिन्दगी में शामिल हैं ।
बताईये । इनमें बकरा काटना । मुर्गा काटना । भैंसा काटना आदि कहाँ है ? ठीक इसी तरह हिन्दू शास्त्रीय यग्यों में जहाँ बलि शब्द का प्रयोग हुआ है । उसका अर्थ वहाँ उतने पशु और वस्तुयें दान करने से हैं । न कि उनका कत्ल और हत्या करने से ।
क़ुरआन में मुसलमानों को मांसाहारी भोजन की अनुमति दी गई है । इसका प्रमाण निम्नलिखित आयतों से स्पष्ट है । ( ऐसा मुसलमान कहते हैं । मुसलमानों की यही सोच है । यही धारणा है । ) देखते हैं । सत्य क्या है ?

 अब कुरआन की ये आयत देखिये ।
तुम्हारे लिए मवेशी ( शाकाहारी पशु ) प्रकार के समस्त जानवर हलाल किये गए हैं । क़ुरआन । 5:1।
उसने पशु उत्पन्न किये । जिनमें तुम्हारे लिए पोशाक भी है । और खुराक भी । और तरह तरह के दूसरे फ़ायदे भी । क़ुरआन । 16:5 ।

*** ये कोष्ठक में किसी ने ..शाकाहारी पशु..अपने मन से जोङ दिया है । जो कि मूल आयत में नहीं हैं । ऐसे ही ब्रेकिट में अपने शब्द जोङकर अर्थ का अनर्थ किया गया है । अब देखिये - मवेशी का सही अर्थ .. शाकाहारी पशु..न होकर पालतू जानवर या उपयोगी जानवर होता है । और " हलाल " का मतलब सिर्फ़ काटना या मारना नहीं बल्कि - वैध । उचित । ईमानदारी और कानूनी दायरे में आने वाला कर्म है । कहा भी जाता है - ये हराम की कमाई नहीं । बल्कि हलाल की कमाई है । हाँ इस जगह यदि " हलाक " शब्द का प्रयोग हुआ होता । तो फ़िर ऐसी गुंजाइश नहीं थी ।
अब भावार्थ देखिये - तुम्हारे लिये पालतू की श्रेणी में आने वाले भैंस बकरी भेङ ऊँट आदि ही उचित हैं । अर्थात इनसे दूध ऊन आदि कई तरह की चीजें प्राप्त होती हैं ।
यहाँ गहरायी से सोचने वाली बात ये है कि आज से 1400 वर्ष पहले जब अरब.. असभ्य । लूट खसोट करने वाले । निर्दयता से किसी की भी हत्या कर देने वाले थे । तो अल्लाह मुहम्मद साहब के माध्यम से फ़िर क्या नयी बात बता रहा था ? कुरैश और अन्य कबीले वाले बकरा ऊँट आदि जानवरों को पहले ही काटते और खाते थे । उनकी खाल का पोशाक के रूप में प्रयोग भी उन्हें पता था । उनके अन्य फ़ायदे भी उस समय इस्लाम का विरोध करने वालों को पता थे । आज भी आदिवासी जैसे लोग जानते हैं कि किस जानवर का मांस खाना उचित है । और किसका अनुचित ? मैंने आज तक किसी को गैंडा शेर चीता हाथी जैसे जानवरों का माँस खाते नहीं पढा या सुना ।
तो बताईये । ऊपर की आयत में ऐसी क्या खास बात है ?? जो उस समय या आज के समय में लोग नहीं जानते ? और जिसको खुद अल्लाह को बताना पङा ।
मैं बताता हूँ । वो खास क्या था ? मुहम्मद साहब ने कहा - इस रेगिस्तानी क्षेत्र में उपयोगी पशु वैसे भी कम हैं । और तुम उन्हें मारकर खाकर हजम करे ले रहे हो । इसके बजाय इनके विभिन्न उपयोग । जानवरों को पालकर उनकी संख्या में वृद्धि करना । दूध का उत्पादन बङाना । सामान ढोने । सवारी के रूप में प्रयोग करना आदि पर ध्यान दो । अगर उन्हें मारकर ही खाना बताया था । तो वो तो कुरैश भी जानता था । फ़िर इसमें अल्लाह की बात या क्या नया था ?

अब कुरआन की ये दूसरी आयत देखिये ।
और हकीकत यह है कि तुम्हारे लिये दुधारू पशुओं में भी एक शिक्षा है । उनके पेटों में जो कुछ है । उसी में से एक चीज़ ( अर्थात दूध ) हम तुम्हें पिलाते हैं । और तुम्हारे लिए इनमें बहुत से दूसरे फ़ायदे भी हैं । इनको तुम खाते हो । और इन पर और नौकाओं पर सवार भी किये जाते हो । क़ुरआन । 23:21 ।
****मुझे दो बातों पर बहुत हँसी आती है । एक तो कुरआन दिव्य ग्यान है । और दूसरा - इसकी आयतों की तरह कोई दूसरी आयत नहीं बना सकता । या इसमें कुछ मिलाया नहीं जा सकता ।
ऊपर लिखी आयत को गौर से नहीं सिर्फ़ साधारण तरीके से ही पढें । और सोचें कि आज से 1400 साल पहले से.. और भी बहुत पहले ? क्या तमाम लोग इस आयत में जो लिखा है । उस बात को नहीं जानते थे ? इस आयत में क्या खास बात है । जो अल्लाह को खुद बताना पङा । nothing
अब मुख्य बात देखिये - उल्टा अर्थ किस तरह हो गया ? मुहम्मद साहब का मतलब था कि बे मतलब ही इन बेहद उपयोगी पशुओं को तुम एक बार की खुराक के लिये मार डालते हो । इनको जिन्दा रखने पर बहुत से फ़ायदे होंगे । इन दुधारू पशुओं के दूध से तुम खाने की तमाम चीजें दूध दही छाछ खोआ मिठाई पनीर घी आदि बहुत सी चीजें प्राप्त कर सकते हो । फ़िर इनके व्यापार से धन प्राप्त कर सकते हो । जिन चीजों को तुम खाते भी हो । और पशु ( ऊँट ) का वाहन रूप में भी इस्तेमाल करते हो । हँसी और आती है । एक बेहद मामूली अनपढ आदमी भी ये बात बिना किसी के बताये ही जानता है ।

लोगो ! धरती पर जो पवित्र और वैध चीज़ें हैं । उन्हें खाओ । और शैतान के बताए हुए रास्तों पर न चलो । वह तुम्हारा खुला दुश्मन है । क़ुरआन । 2 । 168
*** देखो ! जो बात मैंने ऊपर कही । वही बात स्पष्ट हो गयी । इस आयत को गहरायी से सोचो । मुहम्मद साहब यहाँ माँस खाने की मनाही कर रहे हैं । न कि जीवों को खाने की सलाह दे रहें हैं । वह कह रहें है । ये जीवहत्या से प्राप्त भोजन शैतानी है । ये तुम्हें नरक का रास्ता दिखायेगा । इससे बचो ।
सोचने वाली बात है कि माँस खाने की सलाह दे रहे होते । तो वो सब पहले से ही खाते थे । खुद ही जानते थे । फ़िर अल्लाह क्या नयी बात बता रहा था ?
*****


वह उन्हें नेकी का हुक्म देता है । बदी से रोकता है । उनके लिए पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है । उन पर से वह बोझ उतारता है । जो उन पर लदे हुए थे । वह बंधन खोलता है । जिनमें वे जकड़े हुए थे । क़ुरआन । 7 । 157 ।
जो कुछ रसूल तुम्हें दे । तो वह ले लो । और जिस चीज़ें से तुम्हें रोक दे । उसमें रुक जाओ । अल्लाह से डरो । अल्लाह सख़्त अज़ाब ( कठोरतम दण्ड ) देने वाला है । क़ुरआन । 7 । 159 ।
**** वैसे इन दो आयतों में भी कोई खास बात नहीं है । एकदम साधारण बात लिखी है । लेकिन लेख बङा हो रहा है । इसलिये फ़िर कभी ।
अब आईये । हिन्दू गृंथ से उपजी गलतफ़हमी को देखें ।
गोमांसं भक्ष्हयेन्नित्यं पिबेदमर वारुणीम । कुलीनं तमहं मन्ये छेतरे कुल घातकाः । अध्याय 3 । श्लोक 47 । हठयोग प्रदीपिका

देखिये ऊपर लिखे श्लोक का सामान्य लोग अग्यानतावश ये अर्थ करते हैं । ..
कुलीन लोग गौ मांस व सोमरस का नित्य सेवन करते हैं । और न करने वाले कुल घातक हैं ।
थू.. थू है तुम पर । और तुम्हारे भारतवासी होने पर ।
अब देखो इसका सही अर्थ - पहली बात अक्ल के अँधो ! ये है कि योग की पुस्तक को इस बात से क्या मतलब  । किसी भी धर्म पुस्तक को इससे क्या मतलब कि - तुम दाल खाते हो । या मठ्ठा पीते हो । करेला खाते हो । या बैंगन खाते हो । या फ़िर पशु पक्षी जैसा अभक्ष्य खाते हो । योग या भक्ति की पुस्तक अपने विषय की बात करेगी । या तुम्हारे किचन या पेट भरने की बात करेगी ।
अब अर्थ पर आ जाओ - दुनियाँ को अंधे कुँये में धकेलने वाले तोताराम छाप पंडितो..गौर से देखो । श्लोक की शुरूआत ही गोमांस - से हो रही है । और आपने इसका सीधा सीधा अर्थ गाय के माँस से जोङ दिया ।
गो और गौ के भारी अन्तर पर तुम्हारा ध्यान नहीं गया । क्या है ये गोमांस ?
5 ग्यानेन्द्रियों में..आँख । कान । नाक । त्वचा और पाँचवी ये जीभ । इसी जीभ को गोमांस कहा गया है । गो कहते हैं इन्द्री को । और यही एकमात्र इन्द्री ऐसी है । जो मांस की तरह है । या मांस की ही बनी है ।
भक्ष्हयेन्नित्यं - यानी इससे योग क्रिया द्वारा पाप को खा जाओ । और उसका नाश कर दो ।
पिबेदमर वारुणीम - और इस योग क्रिया द्वारा तालू में बूँद बूँद टपकने वाले अमृत का पान करो । जो ऐसा करते हैं । वे कुलीन हैं । अन्य कुल घातक हैं ।
 अब पूरे का भावार्थ - ये योग की एक शक्तिशाली मुद्रा या मुद्रिका है । ये मुद्रिका ही हनुमान जी को सिद्ध थी । जिसके बल पर उन्होंने विशाल सागर पार किया था ।..प्रभु मुद्रिका मेल मुख मांही । जलधि लांघ गयो अचरज नाहीं ।.. इसमें जीभ को अभ्यास करते करते पीछे मोङकर गले में लटकते काग से छुआना होता है । और दूसरी क्रिया में जीभ को मुँह के अन्दर तालू में शुरू में ही एक कमजोर स्थान होता है । यहाँ बारबार टच कराते हैं । इससे अमृत टपकने लगता है । इस क्रिया या योग का क्या महत्व हो सकता है ? इसी से समझ लो कि ये हनुमान जी के पास थी । इसका जानने वाला अपने कुल का उद्धार कर देता है । इसीलिये उसे कुलीन और न करने वाले को कुल घातक कहा गया है ।

गो शब्देनोदिता जिहवा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गो मांस भक्ष्हणं तत्तु महा पातक नाशनम । अध्याय 3 । श्लोक 48 । हठयोग प्रदीपिका
सामान्य अर्थ । जो लोग करते हैं - गो अर्थात जिहवा को ऊपर ले जाकर । और फ़िर पीछे की ओर मोड़कर तालू में लगाकर महापाप भी नष्ट हो जाते हैं । यहाँ पर गो जिहवा है । और गोमांस एक मुद्रा है । और अमर जल जिहवा का रस है ।
अब देखो । इसका सही अर्थ - इन्द्रियों को समेटकर । शब्द यानी अविनाशी नाम से । जो तुम्हारे घट मे स्वतः गूँज रहा है । जोङ दो । फ़िर जिहवा यानी जीभ को तालू में ( जैसा कि मैंने ऊपर बताया । ) उस स्थान से प्रवेश कराओ । ऐसा होते ही । यानी ये योग सिद्ध होते ही..माँस की इस इन्द्री द्वारा तुम्हारे महा पातक यानी महा पाप का भी नाश हो जाता है । अब बताओ । इन दोनों श्लोकों में गौ यानी गाय कहाँ है ? और कहाँ है । उसका माँस ? इसलिये धर्म के नाम पर ऐसा करने वाले हत्यारो - तुम्हें नहीं मालूम तुम अपने लिये कितने कठोर नरक का इंतजाम खुद ही कर रहे हो ?
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