05 मई 2011

उसी क्षण सारे रहस्य खुल जाते हैं

स्वतंत्रता - मोहम्मद का 1 शिष्य है - अली । और अली मोहम्मद से पूछता है कि - बड़ा विवाद है सदा से कि मनुष्य स्वतंत्र है । अपने कृत्य में या परतंत्र । बंधा है कि मुक्त ? मैं जो करना चाहता हूं । वह कर सकता हूं । या नहीं कर सकता हूं ?
सदा से आदमी ने यह पूछा है । क्योंकि अगर हम कर ही नहीं सकते कुछ । तो फिर किसी आदमी को कहना कि चोरी मत करो । झूठ मत बोलो । ईमानदार बनो । नासमझी है । 1 आदमी अगर चोर होने को ही बंधा है । तो यह समझाते फिरना कि चोरी मत करो । नासमझी है । या फिर यह हो सकता है कि 1 आदमी के भाग्य में बदा है कि वह यही समझाता रहे कि चोरी न करो । जानते हुए कि चोर चोरी करेगा । बेईमान बेईमानी करेगा । असाधु असाधु होगा । हत्या करने वाला हत्या करेगा । लेकिन अपने भाग्य में यह बदा है कि अपन लोगों को कहते फिरो कि चोरी मत करो । एब्सर्ड है । अगर सब सुनिश्चित है । तो समस्त शिक्षाएं बेकार हैं । सब प्रोफेट । और सब पैगंबर । और सब तीर्थंकर व्यर्थ हैं । महावीर से भी लोग पूछते हैं । बुद्ध से भी लोग पूछते हैं कि अगर होना है । वही होना है । तो आप समझा क्यों रहे हैं ? किसलिए समझा रहे हैं ? मोहम्मद से भी अली पूछता है कि - आप क्या कहते हैं ? अगर महावीर से पूछा होता अली ने । तो महावीर ने जटिल उत्तर दिया होता । अगर बुद्ध से पूछा होता । तो बड़ी गहरी बात कही होती । लेकिन मोहम्मद ने वैसा उत्तर दिया । जो अली की समझ में आ सकता था । मोहम्मद के उत्तर बहुत सीधे और साफ हैं । अक्सर ऐसा होता है कि जो लोग कम पढ़े लिखे हैं । ग्रामीण हैं । उनके उत्तर सीधे और साफ होते हैं । जैसे कबीर के । या नानक के । या मोहम्मद के । या जीसस के । बुद्ध और महावीर के । और कृष्ण के उत्तर जटिल हैं । वह संस्कृति का मक्खन है । जीसस की बात ऐसी है । जैसे किसी ने लट्ठ सिर पर मार दिया हो ।
कबीर तो कहते ही हैं - कबीरा खड़ा बजार में । लिए लुकाठी हाथ ।
लट्ठ लिए बाजार में खड़े हैं । कोई आए । हम उसका सिर खोल दें ।
मोहम्मद ने कोई बहुत मेटाफिजिकल बात नहीं कही ।
मोहम्मद ने कहा - अली, 1 पैर उठाकर खड़ा हो जा ।
अली ने कहा कि - हम पूछते हैं कि कर्म करने में आदमी स्वतंत्र है कि परतंत्र ? मोहम्मद ने कहा - तू पहले 1 पैर उठा । अली बेचारा 1 पैर । बायां पैर । उठाकर खड़ा हो गया । मोहम्मद ने कहा - अब तू दायां भी उठा ले । अली ने कहा - आप क्या बातें करते हैं ?
तो मोहम्मद ने कहा कि - अगर तू चाहता पहले । तो दायां भी उठा सकता था । अब नहीं उठा सकता । तो मोहम्मद ने कहा कि 1 पैर उठाने को आदमी सदा स्वतंत्र है । लेकिन 1 पैर उठाते ही तत्काल दूसरा पैर बंध जाता है । वह जो नॉन एसेंशियल हिस्सा है हमारी जिंदगी का । जो गैर जरूरी हिस्सा है । उसमें हम पूरी तरह पैर उठाने को स्वतंत्र हैं । लेकिन ध्यान रखना । उसमें उठाए गए पैर भी एसेंशियल हिस्से में बंधन बन जाते हैं । वह जो बहुत जरूरी है । वहां भी फंसाव पैदा हो जाता है । गैर जरूरी बातों में पैर उठाते हैं । और जरूरी बातों में फंस जाते हैं । ओशो
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सादगी भरा व्‍यक्‍ति और प्रसन्‍नता - 1 सादगी भरा व्‍यक्‍ति जान लेता है कि प्रसन्‍नता जीवन का स्‍वभाव है । प्रसन्‍न रहने के लिए किन्‍हीं कारणों की जरूरत नहीं होती । बस तुम प्रसन्‍न रह सकते हो । केवल इसीलिए कि तुम जीवित हो । जीवन प्रसन्‍नता है । जीवन आनंद है । लेकिन ऐसा संभव होता है केवल 1 सहज सादे व्‍यक्‍ति के लिए ही । वह आदमी जो चीजें इकट्ठी करता रहता है । हमेशा सोचता है कि इन्‍ही चीजों के कारण उसे प्रसन्‍नता मिलने वाली है । आलीशान भवन । धन । सुख साधन । वह सोचता है कि इन्‍हीं चीजों के कारण वह प्रसन्‍न है । समस्‍या धन दौलत की नहीं है । समस्‍या है आदमी की दृष्‍टि की । जो धन खोजने का प्रयास करती है । दृष्‍टि यह होती है । जब तक मेरे पास ये तमाम चीजें नहीं हो जाती है । मैं प्रसन्‍न नहीं हो सकता हूं । यह आदमी सदा दुखी रहेगा । 1 सच्‍चा सादगी पसंद आदमी जान लेता है कि जीवन इतना सीधा सरल है कि जो कुछ भी है उसके पास । उसी में वह खुश हो सकता है । इसे किसी दूसरी चीज के लिए स्‍थगित कर देने की उसे कोई जरूरत नहीं है । तब सादगी का अर्थ होगा । तुम्‍हारी आवश्‍यकताओं तक आ जाओ । इच्‍छाएं पागल होती हैं । आवश्‍यकताएं स्‍वाभाविक होती हैं । भोजन, घर, प्रेम । तुम्‍हारी सारी जीवन ऊर्जा को मात्र आवश्‍यकताओं के तल तक ले आओ । और तुम आनंदित हो जाओगे । और 1 आनंदित व्‍यक्‍ति धार्मिक होने के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं हो सकता । और 1 अप्रसन्‍न व्‍यक्‍ति अधार्मिक होने के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं हो सकता । हो सकता है । वह प्रार्थना करे । हो सकता है । वह मंदिर जाए । हो सकता है । मस्‍जिद जाये । उससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला । 1 अप्रसन्‍न व्‍यक्‍ति कैसे प्रार्थना कर सकता है ? उसकी प्रार्थना में गहरी शिकायत होगी । दुर्भाव होगा । वह 1 नाराजगी होगी । प्रार्थना तो 1 अनुग्रह का भाव है । शिकायत नहीं । केवल 1 प्रसन्‍न व्‍यक्‍ति ही अनुगृहित रह सकता है । उसका पूरा ह्रदय पुकारता है - 1 समग्र अहो भाव में । उसकी आँखो में आंसू आ जाते हैं । क्‍योंकि परमात्‍मा ने उसे इतना दिया है बिना उसके मांगे ही । और परमात्‍मा ने इतना ज्‍यादा दिया है । तुम्‍हें जीवन मात्र देकर ही । 1 प्रसन्‍न व्‍यक्‍ति प्रसन्‍न होता है केवल इसलिए कि वह सांस ले सकता है । वहीं बहुत ज्‍यादा है । पल भर के लिए श्‍वास लेना मात्र ही पर्याप्‍त होता है । पर्याप्‍त से कहीं ज्‍यादा । जीवन तो इतना आशिष पूर्ण है । लेकिन 1 अप्रसन्‍न व्‍यक्‍ति इसे समझ नहीं सकता । इसलिए ध्‍यान रहे । जितने ज्‍यादा कब्‍जा जमाने की वृति से जुड़ते हो । उतने ही कम प्रसन्‍न होओगे तुम । जितने कम प्रसन्‍न होते हो तुम । उतने ही दूर तुम हो जाओगे परमात्‍मा से । प्रार्थना से । अनुग्रह के भाव से । सीधे सहज होओ । आवश्‍यक बातों सहित जीओ । और भूल जाओ आकांक्षाओं के बारे में । वे मन की कल्‍पनाएं है । झील की तरंगें हैं । वे केवल अशांत ही करती हैं । तुम्‍हें वे किसी संतोष की और तुम्‍हें नहीं ले जा सकती है । ओशो
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सत्य की प्यास है जिन्हें । उन्हीं के लिए हूँ मैं । केवल उन्हीं के लिए । स्वयं का होना तो हो गया पूरा । वह यात्रा पूरी हुई । सरिता खो गई सागर में । बीज मिल गया मिट्टी में । हो गया हूँ - शून्यः । झांको आंखों में मेरी । झांको वहाँ आकाश में - अवकाश में । देखो । कहीं भी दिखाई पड़ता हूँ ? पारदर्शी हो गया हूँ - स्वयं को खोकर । इसलिए जिसके पास भी आँखे हैं । वह मेरे आर पार देख सकता है । अब तो मैं 1 चमत्कार ही हूँ । क्योंकि नहीं हूं । फिर भी हूं ।
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मय्यनन्त महाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना । 
अति शान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ।
- मुझ अन्तहीन महासमुद्र में निश्चय ही संसार कल्पना मात्र है । मैं अत्यन्त शांत हूँ । निराकार हूँ । और इसी अवस्था में स्थित हूँ ।
I am the Soul an endless sea, just immagine a world in which it is,when it does not exist. how can impress me. was the first to understand this vision real ,I was so upset, now I know myself very quiet as formless am,now I have no metatasis, it was all becouse of the mind, now I may not cast as a self..FROM -  ASHTAWAKRA GITA 7/3 19/02/14
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नीत्से का वचन है कि - मैं हंसता रहा हूं । तो लोग समझते हैं । मैं बहुत प्रसन्न हूं । लेकिन जहां तक मैं जानता हूं - अपने बाबत । बात बिलकुल उल्टी है । मैं इसलिए हंसता हूं कि - कहीं रोने न लग जाऊं । तो हंसी में रोने को छिपाये हूं । तुम्हारे सब नाच बहुत गहरे में शिकायत को छिपाये हुए हैं । 
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जिस क्षण अहंकार बिदा हो जाता है । उसी क्षण सारे रहस्य खुल जाते हैं - ओशो ।
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