13 अप्रैल 2011

ईश्वर 1 ही है कोई दूसरा ईश्वर नहीं है

सनातन धर्म - अंकों द्वारा परिचय 
हिन्दू सनातन धर्म के धर्म ग्रंथ वेद और इतिहास ग्रंथ पुराण में उल्लेखित महत्वपूर्ण बातों के बारे में संक्षिप्त में अंकों के माध्यम से बताए जा सकने वाले प्रमुख क्रम की जानकारी । 
अंक 1 - 1 ईश्वर - ईश्वर 1 ही है । कोई दूसरा ईश्वर नहीं है । उसे ही ब्रह्म, परब्रह्म, परमात्मा और परमेश्वर कहा जाता है । वह निराकार, निर्गुण और अजन्मा है । उसकी कोई मूर्ति नहीं बनायी जा सकती । वेद अनुसार उसे छोड़कर और किसी की पूजा और प्रार्थना करने वाला उसके लोक में न जाकर जन्म जन्मांतर तक भटकता रहता है । उसको जो याद करता रहता है । उसके सभी दुख मिट जाते हैं । देवता, दानव, भगवान पितर आदि सभी उसी ईश्वर के अधीन है । वे सब भी उसी की प्रार्थना करते हैं ।
अंक 2 - 2 शक्ति - देवता ( सकारात्मक ) दानव ( नकारात्मक )
2 पक्ष - कृष्ण, शुक्ल । 2 अयन - उत्तरायण, ‍दक्षिणायन ।
2 गति - उर्ध्व, अधो ।
अंक 3 - 3 प्रमुख देव ( त्रिदेव )  ब्रह्मा, विष्णु, महेश ।
3 प्रमुख देवी ( त्रिदेवी )  सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती ( दुर्गा )
3 प्रमुख भगवान - राम, कृष्ण, बुद्ध ।
त्रैलोक्य ( 3 प्रमुख लोक)  भू, भुव, स्वर्ग ।
3 प्रमुख कल्प - ब्रह्म, वराह, पद्य ।
3 गुण - सत्व, रज, तम ।
3 कर्म संग्रह - कर्ता, करण, क्रिया ।
3 कर्म प्रेरणा - ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय ।
अंक 4 - 4 वेदज्ञ ऋषि - अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य । जिन्होंने सर्वप्रथम वेद सुने । बाद में इनकी वाणी को बहुत से ऋषियों ने रचा । और विस्तार दिया । मूलत: इन्हीं 4 को हिन्दू धर्म का संस्थापक माना जा सकता है ।
4 वेद - ऋग, यजु, साम, अथर्व ।
4 आश्रम - ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास ।
4 धाम - जगन्नाथ ( पूर्व - अथर्व ) द्वारिका ( पश्चिम - साम ) बद्रीनाथ ( उत्तर - यजु ) रामेश्वरम ( दक्षिण - ऋग )
4 पीठ - ज्योर्तिपीठ, गोवर्धनपीठ, शारदापीठ, श्रृंगेरीपीठ ।
4 मास - सौरमास, चंद्रमास, नक्षत्रमास, सावनमास ( अधिमास या मलमास )
4 प्रकृति - सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, सावित्री ।
4 पद - ब्रह्मपद, रुद्रपद, विष्णुपद, परमपद ( सिद्धपद )
4 नीतिज्ञ - मनु, अंगिरा, विदुर, चाणक्य ।
4 सम्प्रदाय - वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मृति - संत ।
4 पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ।
4 शत्रु - काम, क्रोध, मोह, लोभ ।
4 प्रलय - नित्य, नैमित्तिक, द्विपारार्ध, प्राकृत ।
4 जीव - अण्डज, स्वेदज, जरायुज, उद्विज ।
4 नीति - साम, दाम, दंड, भेद ।
4 अन्न - भक्ष्य ( चबाकर ) भोज्य ( निगल कर ) लेह्म ( चाटकर )  चोष्य ( चूसकर )
4 युग - सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलयुग ।
अंक 5 - पंच देव - ब्रह्मा, विष्णु, महेष, गणेश, सूर्य ।
5 प्रतीक - ॐ, स्वस्तिक, दीपक, माला, कमल ।
5 अमृत ( पंचामृत ) - दूध, दही, घी, शहद, शक्कर ।
5 कुमार - सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, स्वायंभुव ।
5 कर्मेंद्रियां - वाक, पाणि, पाद, पायु, उपास्थ ।
5 ज्ञानेंद्रियां - चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक, श्रोत ।
5 चित्तावस्था - क्षिप्त, मूढ़, ‍विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध ।
5 क्लेश - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वैष, अभिनिवेश ।
वर्ष के 5 भेद - संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर, युगवत्सर ।
कामदेव के 5 बाण - मारण, स्तम्भन, जृम्भन, शोषण, उम्मादन ( मन्मन्थ )
5 महाभूत - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश ।
मन, बुद्धि और अहंकार को भी महाभूत कहा गया है ।
5 काल - प्रात:काल, संगवकाल, मध्यान्हकाल, अपरान्हकाल, सायंकाल । 1 काल में 3 मूहर्त होते हैं ।
अंग - 6 छ: मुक्ति - 1 सार्ष्टि ( ऐश्वर्य ) 2 सालोक्य ( लोक की प्राप्ती ) 3 सारूप ( ब्रह्म स्वरूप ) 4 सामीप्य ( ब्रह्म के पास ) 5 साम्य ( ब्रह्म
जैसी समानता ) 6 लीनता या सामुज्य ( ब्रह्म में लीन हो जाना ) ब्रह्मलीन हो जाना ही पूर्ण मोक्ष है ।
6 शिक्षा - वेदांग, सांख्य, योग, निरुक्त, व्याकरण, छंद ।
6 ऋतु - बसंत, ग्रीष्म, शरद, हेमंत, शिशिर ।
अंग 7 - सप्तऋषि - विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्त ऋषि इस प्रकार है -
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत ।विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन। 
अर्थात सातवें मन्वन्तर में सप्त ऋषि इस प्रकार हैं - वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज । 
7 छंद - गायत्री, वृहत्ती, उष्ठिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, पंक्ति ।
7 योग - ज्ञान, कर्म, भक्ति, ध्यान, राज, हठ, सहज ।
7 भूत - भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल, क्षेत्रपाल ।
7 वायु - प्रवह, आवह, उद्वह, संवह, विवह, परिवह, परावह ।
7 द्वीप - जम्बूद्वीप, पलक्ष द्वीप, कुश द्वीप, शालमाली द्वीप, क्रौंच द्वीप, शंकर द्वीप, पुष्कर द्वीप ।
7 पाताल - अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल ।
7 लोक - भूर्लोक, भूवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक । सत्यलोक को ही ब्रह्म लोक कहते है ।
7 समुद्र - क्षीरसागर, दुधीसागर, घृत सागर, पयान, मधु, मदिरा, लहू । 7 पर्वत - सुमेरु, कैलाश, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सपेल ? माना जाता है कि गंधमादन भी है ।
7 पुरी - अयोध्या, मथुरा, माया ( हरिद्वार ) काशी, कांची, अवंतिका ( उज्जयिनी ) द्वारका ।
अंग 8 - अष्ट विनायक - वक्रतुंड, एकदंत, मनोहर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विध्नराज, धूम्रवर्ण ।
8 भैरव - रुद्र, संहार, काल, असिति, क्रौध, भीषण, महा, खट्वांग ।
8 योगांग - यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान,  समाधि ।
8 नदी - गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु, कावेरी, ब्रह्मपुत्र ।
8 वसु - अहश, ध्रुव, सोम, धरा, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभाष ( यह रहने के 8 स्थान है । तथा अग्नि के 8 प्रकार भी । यह अदिति के 8 पुत्रों के नाम भी है )
8 धातु - सोना, चांदी, लोहा, तांबा, शीशा, कांसा, रांगा, पीतल ।
8 प्रहर - दिन के 4 और रात के 4 मिलाकर 8 प्रहर होते हैं । यानि 1 पहर 4 घंटे का होता है । जैसे प्रात:काल, मध्यकाल, संध्याकाल, ब्रह्मकाल आदि ।
अंक 9 - नवधा भक्ति - श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चना, वंदना, मित्र, दाम्य, आत्म निवेदन ।
9 विधि - पक्ष, महापक्ष, शंख, मकर, कश्यप, कुकंन, मुकन्द, नील, बार्च ।
9  दुर्गा - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंद, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिरात्रि । ऐसा भी कह सकते हैं - काली,
कात्यायानी, ईशानी, चामुंडा, मर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता, वैष्णवी ।
अंक 10 - 10 दिशा - ( 10 दिग्पाल ) पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, वायव, नैऋत्य, आग्नेय, ईशान ।
10 अवतारी पुरुष - मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशु, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि ।
ब्रह्मा के 10 मानस पुत्र - ( मन से उत्पन्न ) मरिचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्य, प्रचेता, भृगु, नारद, महातपस्वी वशिष्ट ।
साधुओं के 10 संप्रदाय - 1 गिरि  2 पर्वत 3 सागर 4 पुरी  5 भारती  6 सरस्वती  7 वन  8 अरण्य 9 तीर्थ 10 आश्रम ।
10 महाविद्या - काली, तारादेवी, ललिता - त्रिपुरसुन्दरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंकि, कमला ।
अंक 11 - 11 रुद्र - महान, महात्मा, गतिमान, भीषण, भयंकर, ऋतुध्वज, ऊर्ध्वकेश, पिंगलाक्ष, रुचि, शुचि, कालाग्नि रुद्र ।  यह भी अदिति के पुत्र है । इसमें कालाग्नि रुद्र ही मुख्य है ।
अंक 12 - 12 आदित्य - ब्रह्मा के पुत्र मरिचि, मरिचि के कश्यप, और कश्यप की पत्नी अदिति, अदिति के आदित्य ( सूर्य ) कहलाए । जो इस प्रकार है - अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषन, भग,
मित्र, वरुण, वैवस्वत, विष्णु । यह 12 ही 12 मास के प्रतीक है । सूर्य की 12 कला - तपिनी, तापिनी, ध्रूमा, मारिचि, ज्वालिनी, रुचि, सुक्षमन, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी, क्षमा ।
अंक 14 - 14 भुवन - अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल, भूर्लोक, भूवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक ।
14 रत्न - अमृत, ऐरावत, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, उच्चैश्रवा घोड़ा, शंख, चंद्रमा, धनुष, कामधेनु, धनवंतरि वैद्य, रम्भा अप्सरा, लक्ष्मी, वासुकी, वृक्ष ।
14 मनु - ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभुव, अत्रि के पुत्र स्वारोचिष, राजा प्रियव्रत के पुत्र तापस और उत्तम, रैवत, चाक्षुष, सूर्य के पुत्र श्राद्धेदंव ( वैवस्वत ) सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, चंद्रसावर्णि । मनुओं के नाम पर मनवंतर के नाम रखे गए हैं ।
14 इंद्र - स्वर्ग पर राज करने वाले 14 इंद्र माने गए हैं । इंद्र 1 पद का नाम है । किसी व्यक्ति या देवता का नहीं । इंद्र 1 काल का नाम भी है - जैसे 14 मनवंतर में 14 इंद्र होते हैं । 14 इंद्र के नाम पर ही मनवंतरों के अंतर्गत होने वाले इंद्र के नाम भी रखे गए हैं । प्रत्येक मनवंतर में 1 इंद्र हुए हैं । जिनके नाम इस प्रकार हैं - यज्न, विपस्चित, शीबि, विधु, मनोजव, पुरंदर, ऊर्जस्वी ,बाली, अदभुत, शांति, विश, रितुधाम, देवास्पति, सुचि ।
अंक 16 - 16 श्रृंगार - उबटन लगाना, स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना, मांग भरना, महावर लगाना, बाल संवारना, तिलक लगाना, ठोढी़ पर तिल बनाना, आभूषण धारण करना, मेंहदी रचाना, दांतों में मिस्सी, आंखों में काजल लगाना, इत्र आदि लगाना, माला पहनना, नीला कमल धारण करना ।
चंद्र की 16 कला - अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण, पूर्णामृत ।
16 संस्कार - गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेध, उपनयन, विद्यारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, विवाहाग्नि, अंत्येष्टि संस्कार ।
16 कला - श्री, भू, कीर्ति, इला, लीला, कांति, विद्या, विमला, उत्कर्शिनी, ज्ञान, क्रिया, योग, प्रहवि, सत्य, इसना, अनुग्रह ।
अंक 18 - 18 पुराण - गरुण, भागवत, हरिवंश, भविष्य, लिंग, पद्य, वामन, कूर्म, ब्रह्म वैवर्त, मत्स्य, स्कंद, ब्रह्म, नारद, कल्कि, अग्नि, शिव, विष्णु, वराह ।
अंक 33 - 33 देवता - 12 आदित्य 8 वसु 11 रुद्र और इंद्र व प्रजापति नाम से 33 संख्या देवताओं की मानी गई है । प्रत्येक देवता की विभिन्न कोटियों की दृष्टि से 33 कोटि ( करोड़ ) संख्या लोक व्यवहार में प्रचलित हो गई । जो लोग 33 करोड़ या 36 करोड़ देवी देवताओं के होने की बात करते हैं । वे किस आधार पर करते हैं । यह  नहीं मालूम ।
अंक 49 - रुद्रदेव के पुत्र 49 मरुद्गण - मरुत अर्थात पहाड़ । मरुद्गण का अर्थ मरुतों के गण । गण याने देवता । चारों वेदों में मिलाकर मरु द्देवता के मंत्र 498 हैं । यह भी उलेखित मरुतों का गण 7-7 
का होता है । इस कारण उनको 'सप्ती' भी कहते हैं । 7-7 सैनिकों की 7 पंक्तियों में ये 49 रहते हैं । और प्रत्येक पंक्ति के दोनों ओर 1-1  पार्श्व रक्षक रहता है । अर्थात ये रक्षक 14 होते हैं । इस तरह सब मिलकर 49 और 14 मिलकर 63 सैनिकों का 1 गण होता है । 'गण' का अर्थ 'गिने हुए सैनिकों का संघ '। प्रत्येक के नाम अलग अलग  होते हैं ।
अंक 59 - ब्रह्मा के पुत्र - विष्वकर्मा, अधर्म, अलक्ष्मी, 8  वसु, 4 कुमार, 14 मनु, 11 रुद्र, पुलस्य, पुलह, अत्रि, क्रतु, अरणि, अंगिरा, रुचि, भृगु, दक्ष, कर्दम, पंचशिखा, वोढु, नारद, मरिचि, अपान्तरतमा, वशिष्ट, प्रचेता, हंस, यति । कुल 59 पुत्र । 
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