15 अप्रैल 2011

जिनकी सुगंध अलौकिक होती है

चमत्कारों के संबंध में आपका क्या खयाल है ? 
ओशो - चमत्कार शब्द का हम प्रयोग करते हैं । तो साधु संतों का खयाल आता है । अच्छा होता कि पूछा होता कि मदारियों के संबंध में आपका क्या खयाल है ? दो तरह के मदारी हैं - एक । जो ठीक ढंग से मदारी हैं - आनेस्ट । वे सड़क के चौराहों पर चमत्कार दिखाते हैं । दूसरे ऐसे मदारी हैं - डिसआनेस्ट । बेईमान । वे साधु संतों का वेश सिद्ध करके, वे ही चमत्कार दिखलाते हैं । जो चौरस्तों पर दिखाये जाते हैं । ईमानदार मदारी जो स्वागत योग्य है । क्योंकि उसमें एक कला है । बेईमान मदारी सिनर है । अपराधी है । क्योंकि मदारीपन के आधार पर, वह कुछ और माँग रहा है । अभी मैं पिछले वर्ष एक गाँव में था । एक बूढ़ा आदमी आया । मित्र लेकर आये थे । और कहा कि आपको कुछ दिखलाना चाहते हैं । मैंने कहा - दिखाएँ । उस बूढ़े आदमी ने अदभुत काम दिखलाये । रुपए को मेरे सामने फेंका । वह दो फीट ऊपर जाकर हवा में विलीन हो गया । फिर पुकारा । वह दो फीट पहले हवा में प्रकट हुआ । हाथ में आ गया । मैंने उस बूढ़े आदमी से कहा - बड़ा चमत्कार करते हैं आप । उसने कहा - नहीं । यह कोई चमत्कार नहीं है । सिर्फ हाथ की तरकीब है । मैंने कहा - तुम पागल हो । सत्य साई बाबा हो सकते थे । क्या कर रहे हो ? क्यों इतनी सच्ची बात बोलते हो ? इतनी ईमानदारी उचित नहीं है । लाखों लोग तुम्हारे दर्शन करते । तुम्हें मुझे दिखाने न आना होता । मैं ही तुम्हारे दर्शन करता । वह बूढ़ा आदमी हँसने लगा । कहने लगा - चमत्कार कुछ भी नहीं है । सिर्फ हाथ की तरकीब है । उसने सामने ही कोई मुझे मिठाई भेंट कर गया था । एक लड्डू उठाकर मुँह में डाला । चबाया । पानी पी लिया । फिर उसने कहा कि नहीं, पसंद नहीं आया । फिर उसने पेट जोर से खींचा । पकड़कर, लड्डू को वापिस निकालकर सामने रख दिया । मैंने कहा - अब तो पक्का ही चमत्कार है । उसने कहा कि - नहीं । अब दुबारा आप कहिये । तो मैं न दिखा सकूँगा । क्योंकि लड्डू छिपाकर आया । और वह लड्डू पहले मैंने ही भेंट भिजवाया था । इससे पहले जो दे गया है । अपना ही आदमी है । मगर या ईमानदार आदमी है । एक अच्छा आदमी है । यह मदारी समझा जायेगा । इसे अगर कोई संत समझता । तो बुरा न था । कम से कम सच्चा तो था । लेकिन मदारियों के दिमाग हैं । और वह कर रहे हैं यही काम । कोई राख की पुड़िया निकाल रहा है । कोई ताबीज निकाल रहा है । कोई स्विस मेड घड़ियाँ हवा से निकाल रहा है । और छोटे, साधारण नहीं । जिनको हम साधारण नहीं कहते हैं । गवर्नर हैं । वाइस चांसलर हैं । हाईकोर्ट के जजेस हैं । वह भी मदारियों के आगे हाथ जोड़े खड़े हैं । इससे सिर्फ यह पता चलता है कि हमारे जजेस, हमारे वाइस चांसलर, हमारे गवर्नर भी ग्रामीण से ऊपर नहीं उठ सके हैं । उनकी बुद्धि भी साधारण ग्रामीण आदमी से ज्यादा नहीं । फर्क इतना है कि ग्रामीण आदमी के पास सर्टिफिकेट नहीं है । उनके पास सर्टिफिकेट हैं । ये सर्टिफिकेट ग्रामीण हैं । यह चमत्कार । इस जगत में चमत्कार जैसी चीज सच में होती नहीं । हो नहीं सकती । इस जगत में जो कुछ होता है । नियम से होता है । हाँ, यह हो सकता है । नियम का हमें पता न हो । यह हो सकता है कि कार्य, कारण का हमें बोध न हो । यह हो सकता है कि कोई लिंक, कोई कड़ी अज्ञात हो । जो हमारी पकड़ में नहीं आती । इसीलिए बाद की कड़ियों को समझना बहुत मुश्किल हो जाता है । बाकू में उन्नीस सौ सत्रह के पहले । जब रूस में क्रांति हुई थी । उन्नीस सौ सत्रह के पहले, बाकू में एक मंदिर था । उस मंदिर के पास प्रति वर्ष एक मेला लगता था । यह दुनिया का सबसे बड़ा मेला था । कोई दो करोड़ आदमी वहाँ इकट्ठे होते थे । और बहुत चमत्कार की जगह थी वह । वह जो मंदिर की जगह थी । वह अग्नि का मंदिर था । और एक विशेष दिन को, एक विशेष घड़ी में, उस अग्नि के मंदिर में, आपने आप अग्नि उत्पन्न होती थी । वेदी पर अग्नि की लपटें प्रकट हो जाती थी । लाखों लोग खड़े होकर देखते थे । कोई धोखा न था । कोई जीवन न था । कोई आग जलाता न था । भगवान प्रगट होते, अग्नि के रूप में । अपना आप । फिर उन्नीस सौ सत्रह में रक्त क्रांति हो गई । जो लोग आए । वह विश्वासी नहीं थे । उन्होंने मड़िया उखाड़कर फेंक दी । और गडडे खोदे । पता चला । वहाँ तेल के गहरे कुएँ हैं । मिट्टी के तेल के । मगर फिर भी यह तो बात साफ हो गयी कि मिट्टी के तेल के घर्षण से भी आग पैदा होती है । अपने झुकाव के, तभी नीचे के तेल में घर्षण हो पाता है । इसलिए निश्चित दिन पर प्रतिवर्ष वह आग पैदा हो जाती है । जब यह बात साफ हो गयी । तब वहाँ मेला लगना बंद हो गया । अब भी वहाँ आग पैदा होती है । लेकिन अब कोई इकठ्ठा नहीं होता है । क्योंकि कार्य, कारण का पता चल गया है । बात साफ हो गई है । अग्नि देवता अब भी प्रकट होते हैं । लेकिन वह केरोसिन देवता होते हैं । अब अग्नि देवता नहीं रह गए । चमत्कार जैसी कोई चीज नहीं होती । चमत्कार का मतलब सिर्फ इतना ही होता है कि कुछ है । जो अज्ञात है । कुछ है । जो छिपा है । कोई कड़ी साफ नहीं है । वह हो रहा है । एक पत्थर होता है अफ्रीका में । जो पानी को, भाप को पी जाता है । पारस होता है । थोड़े से उसमें छेद होते हैं । वह भाप को पी लेता है । तो वर्षा में भी वह भाप को पी जाता है । काफी भाप को पी जाते हैं । उस पत्थर का पारस होना दिखाई नहीं पड़ता । लेकिन वह स्पंजी है । उसकी मूर्ति बन जाती है । वह मूर्ति जब गर्मी पड़ती है । जैसे सूरज से अभी पड़ रही है । उसमें से पसीना आने लगता है । उस तरह के पत्थर और भी दुनिया में पाये जाते हैं । पंजाब में एक मूर्ति है । वह उसी पत्थर की बनी हुई है । जब गर्मी होती है । तो भक्तगण पंखा झलते हैं । उस मूर्ति को कि भगवान को पसीना आ रहा है । और बड़ी भीड़ इकट्ठी होती है । क्योंकि बड़ा चमत्कार है । पत्थर की मूर्ति को पसीना आए । तो जब मैं उस गाँव में ठहरा था । तो एक सज्जन ने मुझे आकर कहा कि - आप मजाक उड़ाते हैं । आप सामने देख लीजिए चलकर । भगवान को पसीना आता है । और आप मजाक उड़ाते हैं । आप कहते हैं । भगवान को सुबह सुबह दातुन क्यों रखते हो । पागल हो गये हो ? पत्थर को दातुन रखते हो ? पागल हो गए हो । कहते हो । भगवान सोयेंगे । अब भोजन करेंगे । जब उनको पसीना आ रहा है । तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो सकती हैं । वह ठीक कह रहा है । उसे कुछ पता नहीं है कि वह जो पत्थर है । पारस है । वह भाप को पी जाता है । गर्मी पड़ती है । उसमें से पसीना निकलता है । जिस ढंग से आपमें पसीना बह रहा है । उसी ढंग से उसमें भी । तो शरीर की अपनी एयरकंडीशनिंग की व्यवस्था है । वह पानी को छोड़ देता है । ताकि पानी भाप बनकर उड़े । और शरीर को ज्यादा गर्मी न लगे । वह पत्थर भी पानी पी गया है । लेकिन जब तक हमें पता नहीं है । तब तक बड़ा मुश्किल होता है । फिर इस संबंध में । जिस वजह से उन्होंने पूछा होगा । वह मेरे खयाल में है । दो बातें और समझ लेनी चाहिए । एक तो यह कि चमत्कार संत तो कभी नहीं करेगा । नहीं करेगा । क्योंकि कोई संत आपके अज्ञान को न बढ़ाना चाहेगा । और कोई संत आपके अज्ञान का शोषण नहीं करना चाहेगा । संत आपके अज्ञान को तोड़ना चाहता है । बढ़ाना नहीं चाहता । और चमत्कार दिखाने से होगा क्या ? और बड़े मजे की बात है । क्योंकि पूछते हैं कि जो लोग राख से पुड़िया निकालते हैं । आकाश से ताबीज गिराते हैं । काहे को मेहनत कर रहे हैं । राख की पुड़िया से किसका पेट भरेगा ? एटामिक भट्टियाँ आकाश से उतारो । कुछ काम होगा । जमीन पर उतारो । गेहूँ उतारो । गेहूँ के लिए अमेरिका का हाथ जोड़ों । और असली चमत्कार हमारे यहाँ हो रहे हैं । तो गेहूँ क्यों नहीं उतार लेते हो ? राख की पुड़िया से क्या होगा ? गेहूँ बरसाओ । जब चमत्कार ही कर रहे हो । तो कुछ ऐसा चमत्कार करो कि मुल्क का कुछ हित हो सके । सबसे ज्यादा गरीब मुल्क है दुनिया का । और सबसे ज्यादा चमत्कार यहाँ हो रहा है । धन बरसाओ । सोना बरसाओ । मिट्टी को सोना बना दो । चमत्कार ही करने हैं । तो कुछ ऐसा करो । स्विस मेड घड़ी चमत्कार में निकले । तो क्या फायदा ? कम से कम मेड इन इंडिया भी निकालो । तो क्या होने वाला है ? मदारीगिरी से होगा क्या ? कभी हम सोचें कि हम इस पागलपन में किस भ्रांति में भटके हैं ?
किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ ।
तो शायद समझ पाओ खुदा ऐसा भी होता है ।
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स्वप्न - एक गांव गया था । किसी ने पूछा कि आप क्या सिखाते हैं ? मैंने कहा - मैं स्वप्न सिखाता हूं । जो मनुष्य सागर के दूसरे तट के स्वप्न नहीं देखता है । वह कभी इस तट से अपनी नौका को छोड़ने में समर्थ नहीं होगा । स्वप्न ही अनंत सागर में जाने का साहस देते हैं ।
कुछ युवक आये थे । मैंने उनसे कहा - आजीविका ही नहीं । जीवन के लिए भी सोचो । सामयिक ही नहीं । शाश्वत भी कुछ है । उसे जो नहीं देखता है । वह असार में ही जीवन को खो देता है ।
वे कहने लगे - ऐसी बातों के लिए पास में समय कहां है ? फिर ये सब  सत्य और शाश्वत की बातें स्वप्न ही तो मालूम होती हैं ?
मैंने सुना । और कहा - मित्रों, आज के स्वप्न ही कल के सत्य बन जाते हैं । स्वप्नों से डरो मत । और स्वप्न कहकर कभी उनकी उपेक्षा मत करना । क्योंकि ऐसा कोई भी सत्य नहीं है । जिसका जन्म कभी न कभी स्वप्न की भांति न हुआ हो । स्वप्न के रूप में ही सत्य पैदा होता है । और वे लोग धन्य हैं । जो कि घाटियों में रहकर पर्वत शिखरों के स्वप्न देख पाते हैं । क्योंकि वे स्वप्न ही उन्हें आकांक्षा देंगे । और वे स्वप्न ही उन्हें ऊंचाइयां छूने के संकल्प और शक्ति से भरेंगे ।
इस बात पर मनन करना है ।  किसी एकांत क्षण में रुक कर इस पर विमर्श करना । और यह भी देखना कि आज ही केवल हमारे हाथों में है । अभी के क्षण पर केवल हमारा अधिकार है । और समझना कि जीवन का प्रत्येक क्षण बहुत संभावनाओं से गर्भित है । और यह कभी पुन: वापस नहीं लौटता है । यह कहना कि स्वप्नों के लिए हमारे पास कोई समय नहीं है । बहुत आत्मघातक है । क्योंकि इसके कारण तुम व्यर्थ ही अपने पैरों को अपने हाथों ही बांध लोगे । इस भाव से तुम्हारा चित्त एक सीमा में बंध जावेगा । और तुम उस अदभुत स्वतंत्रता को खो दोगे । जो कि स्वप्न देखने में अंतर्निहित होती है ।
और यह भी तो सोचो कि तुम्हारे समय का कितना अधिक हिस्सा ऐसे प्रयासों में व्यय हो रहा है । जो कि बिलकुल ही व्यर्थ हैं । और जिनसे कोई भी परिणाम आने को नहीं है ? क्षुद्रतम बातों पर लड़ने । अहंकार से उत्पन्न वाद विवादों को करने । निंदाओं और आलोचनाओं में । कितना समय तुम नहीं खो रहे हो ? और शक्ति और समय अपव्यय के ऐसे बहुत से मार्ग हैं । यह बहुमूल्य समय ही जीवन  शिक्षण  चिंतन, मनन और निदिध्यासन में परिणत किया जा सकता है । इससे ही वे फूल उगाये जा सकते हैं । जिनकी सुगंध अलौकिक होती है । और उस संगीत को सुना जा सकता है । जो कि इस जगत का नहीं है ।
अपने स्वप्नों का निरीक्षण करो । और उनका विश्लेषण करो । क्योंकि कल तुम जो बनोगे । और होओगे । उस सबकी भविष्यवाणी अवश्य ही उनमें छिपी होगी ।
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