02 अप्रैल 2011

हर जाति धर्म में बहुत से ऐसे तर्कशील और खुले दिमाग लोग होते हैं । जो अपने धर्म की हर बात आँख मूँदकर नहीं मानते ।

ओके दैट्स गुड, सर ! आपने मेरे सवाल के जवाब तो दे दिये । मेरे सवाल तो वहाँ पर ही खतम हो गये थे । जहाँ पर मैंने पुछा था कि भक्ती का नाटक क्युँ ( उसका भी आपने जवाब दे दिया था ) लेकिन उसके बाद की जो पंक्तिया थी ( जो मैंने लिखी थी ) वो सवाल नही थे । सिर्फ़ बात खतम करते हुए अन्तिम पंक्तिया  थी । लेकिन आप ( माफ़ करना ) थोडी ज्यादा होशियारी दिखाने के चक्कर में उस बात ( अन्तिम पंक्ति ) को सवाल समझकर कंफ़्यूज हो गये । और हाँ । आई एम नोट ग्यानी व्यानी । वो तो आप खुद हैं । तभी तो आपसे प्रशन पुछे । शायद मेरा ग्यान भी बढ जाये । तो मेरे सिर्फ़ ४ प्रश्नों का उत्तर और दे दीजिये । आपने कहा था कि भक्ति से सतगुण बडता है । लेकिन सन्तों के अनुसार ये सत, रज और तम तीन गुण प्रकृति का हिस्सा हैं । जैसे मुख्य तत्व 5 हैं । उसी तरह मुख्य गुण 3 हैं । लेकिन मुक्त होने के लिये तो इन तीनों गुणों से भी परे होना होगा । इस बात को आप ही खुलकर समझाइए । दूसरी बात ये आजकल जो लोगों को क्रिकेट का फ़ितूर है । और लोग अलग अलग शहरों में हवन कर रहे हैं । और मनमानी पूजा आदि में लगे हुए हैं । आप बताइए क्या ये पूजा सार्थक है ? और क्या इससे टीम जीत जायेगी । तीसरी बात कुछ साल पहले सुना था कि अमिताभ बच्चन का भी मन्दिर बनाया जा रहा है ( वो बना या नही पता नही और ये किस प्रान्त में होना था याद नही । लेकिन ये बात सुनी जरूर थी ) बताइए उसने ऐसा कौन सा तीर मार दिया । जो उसका मन्दिर बने । उसने जीवन में जो किया । अपने आप के लिये ही किया । और उसका पूरा भोग और ऐशवर्य वो खुद ही तो लूट रहा है । अब लास्ट प्रशन ! मैं शिमला में जहाँ रहती हूँ । वहाँ मेरी 2 सरदार सहेलियाँ भी हैं । मुझे उन लोगों की थ्योरी समझ नही आयी । उनके धर्म के पहले बाबा ( श्री नानक ) ने गुरु परम्परा पर जोर दिया । लेकिन उनके ही धर्म के दसवें गुरु ( गोबिन्द सिंह ) ने गुरु परम्परा पर बिलकुल रोक लगाकर सिर्फ़ सिख धर्म के धार्मिक ग्रन्थ को ही गुरु मानने को कहा । और हाजिर नाजिर गुरू का दर्जा दे दिया । प्लीज इस लास्ट प्रशन में क्या गोरखधन्धा है ? उसको बारीकी से स्पष्ट करें । मुझे आपके उत्तरों का वेट रहेगा । बाई द वे ! मैं अपनी 2 फोटो भेज रही हूँ । मुझे भी अपने ब्लोग में इन्ट्रोडयूस कीजिये । मधु अरोरा । शिमला से । ई मेल से ।

Q 1 आपने कहा था कि भक्ति से सतगुण बडता है । लेकिन सन्तों के अनुसार ये सत, रज और तम तीन गुण प्रकृति का हिस्सा हैं । जैसे मुख्य तत्व 5 हैं । उसी तरह मुख्य गुण 3 हैं । लेकिन मुक्त होने के लिये तो इन तीनों गुणों से भी परे होना होगा । इस बात को आप ही खुलकर समझाइए ।

ANS - ये बात मैंने भाग्य के लिये कही थी कि भाग्य कैसे बनता है । मुक्ति के लिये नहीं कही थी  । थोङा ध्यान से समझकर पढा करो भाई । ये मामूली बातें नहीं है । ..वैसे आपने सही सुना है । मुक्त होने के लिये इन तीन गुणों से भी परे होना पङता है ..कहिय तात सो परम विरागी । तृण सम सिद्धि तीन गुन त्यागी । अर्थात..वही भक्त सर्वश्रेष्ठ है । जो भक्ति से मिलने वाली विभिन्न सिद्धि और तीन गुणों की समस्त सृष्टि को तिनका समझते हुये त्याग देता है । तुच्छ को छोङोगे । तो विराट मिलेगा ।

Q 2 दूसरी बात ये आजकल जो लोगों को क्रिकेट का फ़ितूर है । और लोग अलग अलग शहरों में हवन कर रहे हैं । और मनमानी पूजा आदि में लगे हुए हैं । आप बताइए क्या ये पूजा सार्थक है ? और क्या इससे टीम जीत जायेगी ।

ANS - आपने अपने मेल में कहा था । मैं वैसे तो बहुत कम पूजा करती हूँ । लेकिन जब करती हूँ । तो उसमें डूब जाती हूँ । इसी तरह जब लोगों की भावनायें  सामूहिक रूप से एकाकी होकर किसी कार्य के फ़ल के प्रति इच्छुक होकर एक हो जाती हैं । तो इससे उस कार्य को पोजेटिव एनर्जी प्राप्त होती है । और उस कार्य के होने की संभावना कई गुना बङ जाती है । यही बात गरीब के दिल से निकली सच्ची दुआ । या गरीब को तंग करने । सताने पर उसकी हाय । आदि पर लागू होती है । अमिताभ बच्चन के पेट में चोट लगी थी । तब उनके फ़ेंस द्वारा दिल से की गयी सामूहिक दुआ ने उन्हें बचाने में बहुत बङा योगदान दिया था । आपने यह भी सुना होगा । दवा से दुआ अधिक कीमती होती है । लेकिन ये दुआ या सामूहिक प्रार्थना किसी नये कार्य पर ही कार्य करती है ।
ये दुआ या सामूहिक प्रार्थना वहाँ कार्य नहीं करती । जहाँ पहले से ही कर्मफ़ल तैयार हो चुका हो । मान लीजिये । किसी व्यक्ति को उसके पाप कर्मों की वजह से फ़ाँसी की सजा हो जाय । तो भले ही कितने ही लोग दुआ करें । वो टलेगी नहीं । इसको कर्मगति कहते हैं ।

Q 3 तीसरी बात कुछ साल पहले सुना था कि अमिताभ बच्चन का भी मन्दिर बनाया जा रहा है ( वो बना या नही पता नही और ये किस प्रान्त में होना था याद नही । लेकिन ये बात सुनी जरूर थी ) बताइए उसने ऐसा कौन सा तीर मार दिया । जो उसका मन्दिर बने । उसने जीवन में जो किया । अपने आप के लिये ही किया । और उसका पूरा भोग और ऐशवर्य वो खुद ही तो लूट रहा है ।

ANS - अब अमिताभ बच्चन तो ये बात कहते नहीं कि आप उन्हें भगवान मानों । या उनका मन्दिर बनाओ । ये तो फ़िल्मेनिया के शिकार लोग ऐसा करते हैं । वैसे मेरे ख्याल से इस तरह के मन्दिर कमल हासन । रजनीकान्त । आमिर खान । अक्षय कुमार और कुछ अभिनेत्रियों के भी सुनने में आये हैं । और ज्यादातर साउथ के लोग ऐसा करते हैं । क्या किया जा सकता है । अलग अलग मानसिकता के विचित्र लोग संसार में मौजूद हैं ।


Q 4 अब लास्ट प्रशन ! मैं शिमला में जहाँ रहती हूँ । वहाँ मेरी 2 सरदार सहेलियाँ भी हैं । मुझे उन लोगों की थ्योरी समझ नही आयी । उनके धर्म के पहले बाबा ( श्री नानक ) ने गुरु परम्परा पर जोर दिया । लेकिन उनके ही धर्म के दसवें गुरु ( गोबिन्द सिंह ) ने गुरु परम्परा पर बिलकुल रोक लगाकर सिर्फ़ सिख धर्म के धार्मिक ग्रन्थ को ही गुरु मानने को कहा । और हाजिर नाजिर गुरू का दर्जा दे दिया । प्लीज इस लास्ट प्रशन में क्या गोरखधन्धा है ? उसको बारीकी से स्पष्ट करें ।

 ANS - आपका सोचना एकदम सही है । गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह बङी अजीव बात कही है । वे जिस गुरुगृन्थ साहेब को गुरु मानने की बात कहते हैं । उसी गृन्थ साहिब में लिखी अलग अलग गुरुओं की वाणी गुरु परम्परा और गुरु का महत्व जोर शोर से बयान करती है । मतलब उसका सार यह है कि बिना गुरु के किसी कीमत पर उद्धार नहीं हो सकता । अतः किसी भी इंसान को सच्चे गुरु की शरण में जाकर उनसे नामदान लेना या उपदेश लेना या दीक्षा लेना अति आवश्यक है । इस तरह गुरु गोबिंद सिंह जी की ये बात बङी अजीव और विरोधाभासी लगती है ।
इस सम्बन्ध में कुछ अनुभवी लोगों ने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह जी के समय में गुरु गद्दी को लेकर घमासान मच जाता था कि अब या अगला गुरु कौन होगा । एक राजनीति जैसा माहौल बनने लगा था । इससे सिख धर्म में फ़ूट भी पङ सकती थी । और वह कई खेमों में बँट सकता था । संभवतः इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऐसा फ़रमान जारी कर दिया हो ।
वास्तव में कोई भी गद्दी पर बैठने से गुरु नहीं हो जाता । उसका ग्यान भक्ति और अंतर्जगत में पहुँच के आधार पर गुरु पद होता है । और इसको इंसान नहीं तय करते । बल्कि यह ऊपरी अलौकिक सत्ता द्वारा तय होता है । ऐसे पहुँचे हुये गुरु को खुद को साबित करना होता है । सच बात तो यही है ।
लेकिन मेरे अनुभव के अनुसार सभी सिख इस बात को मानते हों । ऐसा नहीं लगता । मैं जब भी अलग अलग तपोभूमि आश्रमों आदि में गया । और कई अन्य स्थानों पर जब सिखों से मेरी मुलाकात हुयी । तो बाकायदा उनके गुरु थे । और उन्होंने नामदान लिया हुआ था ।
दरअसल हर जाति धर्म में बहुत से ऐसे तर्कशील और खुले दिमाग लोग होते हैं । जो अपने धर्म की हर बात आँख मूँदकर नहीं मानते ।
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