22 अप्रैल 2011

आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ 4

नारायण ! विश्वरूप मण्डन मिश्र कहते है - हे यतिश्रेष्ठ ! आप लोग जीव और ब्रह्म की वास्तविक विशुद्ध एक रूपता स्वीकार करते हैं । परन्तु इस विषय में हम तो कोई भी प्रबल प्रमाण नहीं जानते । अर्थात कोई प्रमाण नहीं है । नारायण ! विश्वरूप मण्डन पण्डित का अभिप्राय यह है कि जैसे प्रमाणान्तर से अवगत अर्थ के बोधक लौकिक वाक्य स्वतः प्रमाण नहीं है । वैसे ही घटादि के समान सिद्धार्थ ब्रह्म के अनुवादक मात्र होने से उपनिषद भी प्रमाण नहीं है । प्रत्यक्षादि प्रमाण के विषय भूत अर्थ का श्रुति से प्रतिपादन नहीं होता । जैसे भूतार्थ घटादि प्रत्यक्षादि प्रमाण के विषय होने के कारण उनका श्रुति से प्रतिपादन नहीं होता । वैसे सिद्ध वस्तु ब्रह्म का भी श्रुति प्रतिपादन नहीं करती । दुःख हेय है । और सुख उपादेय है । दुःख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति प्रत्येक प्राणी चाहता है । वही पुरुषार्थ है । सुख के साधन भूत याग आदि उपादेय हैं । और दुःख के साधन भूत हिंसा सुरापान आदि हेय हैं । इसी में श्रुति का तात्पर्य है । परन्तु हेयोपादेय रहित ब्रह्म के प्रतिपादन में पुरुषार्थ का अभाव होने से उपनिषद का प्रमाण निष्फल है । आचार्य सर्वज्ञ शंकर देशिकेन्द्र कहते हैं - हे विश्वरूप मण्डन ! इस विषय में उपनिषद प्रमाण हैं । उद्दालक आदि महान गुरु लोग श्वेतकेतु आदि प्रमुख शिष्यों परमात्मा का आत्मरूप से ग्रहण कराते हैं । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्स्यँ  स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो { छान्दोग्य उपनिषद 6/8/7 }  वही सत्य है । वह आत्मा है ।
हे श्वेतकेतु ! तत्त्वमसि तू अर्थात तेरा आत्मा तत्त्व है । तेरा शरीर तत्त्व वस्तु नहीं । जैसे जल में डाला गया लवण अर्थात नमक घुल जाने से दृष्टिगोचर नहीं होता । वैसे ही ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त होने पर भी दृष्टिगोचर नहीं होता । न चक्षुषा गृह्यते रूप रहित होने से वह चक्षु से गृहीत नहीं होता । याज्ञवल्क्य कहते हैं - अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि तदाऽऽत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि तस्मातत्सर्वमभवत ।
हे जनक ! निश्चय है । तू अभय पद को प्राप्त हुआ है । मैं ब्रह्म हूँ । ऐसा अपने को जान । ऐसा जानने से वह सब ब्रह्म हुआ । ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म ही होता है । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः एकत्व देखने वाले को मोह कहाँ । और शोक कहाँ ? इत्यादि श्रुति प्रमाण, युक्ति और उदाहरणों से जीव ब्रह्म की एकता सिद्ध होती है । ब्रह्मात्म भाव सिद्ध वस्तु होने पर भी तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि इत्यादि श्रुति अतिरिक्त प्रमाण से अनवगत होने के कारण घटादि के समान प्रत्यक्षादि प्रमाण का विषय नहीं है । यथा न चक्षुषा गृह्यते { मुण्डक 3/1/8 } वह आँख से नहीं देखा जा सकता । यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह { तैत्तिरीय 3/4/1 } अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों के अविषय अनधिगत अर्थ को अवगत कराने वाले वेदान्त प्रत्यग भिन्न ब्रह्म में ही प्रमाण है । हेयोपादेय रहित होने से ब्रह्मात्म भाव अपुरुषार्थ भी नहीं है । क्योँकि हेयोपादेय रहित ब्रह्मात्म भाव अवगत होने से ही सब दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति रूप पुरुषार्थ सिद्ध ही है । उपादेय 2 प्रकार का है - यथा प्राप्त ग्राम आदि । दूसरा प्राप्त होने पर भी भ्रमवश अप्राप्त के समान जानना । जैसे कण्ठस्थ भूषण । एवं हेय भी 2 प्रकार का है - प्रथम यथा अहीन व्यावहारिक सर्पादि । दूसरा हीन । जैसे पैर के नुपुर आदि भूषणों में सर्प का भ्रम । ब्रह्मात्म भाव में प्रथम प्रकार का हेयोपादेय तो यद्यपि नहीं है । तो भी अविद्या से समारोपित शोक आदि तत्त्वमसि आदि वेदान्त वाक्यों से उत्पन्न तत्त्व ज्ञान से आत्म साक्षात्कार होने पर निवृत्त हो जाते हैं । और प्राप्त भी आनन्द अप्राप्त इव प्राप्त होता है । त्यक्त शोकादि अत्यक्त के समान त्यक्त होते हैं । अर्थात नित्य निवृत्त शोक आदि की निवृत्ति । और नित्य प्राप्त परमानन्द की प्राप्ति पुरुषार्थ है । विश्वरूप मण्डन मिश्र कहते हैं - वेदावसानेषु हि तत्त्वमादिवचांसि जसान्यघमर्षणानि । हुं फण्मुखानीव वचांसि योगिन्नैषां विवक्षाऽस्ति कुहस्विदर्थे । अर्थात जैसे वेद में हूँ, फट आदि मुख्य वाक्य जप पाठ करने से पाप नाशक होते हैं । वैसे ही वेदान्तों में तत्त्वमसि आदि वाक्य जप करने से पाप निवर्तक होते हैं । अतः हे योगिन ! इन तत्वमसि आदि वाक्यों की जप आदि से अतिरिक्त किसी अर्थ में विवक्षा नहीं है । भाष्यकार सर्वज्ञ शंकर देशिक कहते हैं - किसी अर्थ के प्रतीत न होने पर विद्वानों ने हूँ, फट आदि को जपोपयोगी कहा है । परन्तु हे प्राज्ञ ! यहाँ तत्वमसि के विषय में तो स्पष्ट अर्थ प्रतीत होता है । तो वह जपार्थक कैसे होगा ? मण्डन मिश्र कहते हैं - हे यतिवर ! किसी अंश में आपका यह कथन ग्राह्य है । परन्तु  तत्वमसि वाक्य से जीव ईश्वर का अभेद आपतपः { विना विचार किये } प्रतीत होता है । वस्तुतः वह यज्ञादि कर्मों के कर्ता की प्रशंसा के द्वारा विधि का अंग ही है । अभेद बोध से तो केवल जीवात्मा की नित्यता प्रकट करता है । क्योँकि आत्मा को नित्य समझने पर पुरुष यज्ञादि कर्मोँ से प्रवूत्त होता है । अन्यथा नहीं । अतः वेद का ज्ञान काण्ड कर्म काण्ड के सिद्ध वस्तु ब्रह्म के लिए नहीं । आचार्य भगवत्पाद शंकर देशिकेन्द कहते हैं - हे प्राज्ञ ! कर्म काण्ड में आदित्यो यूपः आदित्य युप है { यूप कहते हैं - स्थूणा को यह प्रायः बाँस या खदिर वृक्ष की लकड़ी से बनाई जाती है । जिसके साथ बलि दिया जाने वाला पशु, मेघ के समय बाँध दिया जाता है । यूप विजय स्मारक को भी कहा जाता है } इत्यादि अनेक वाक्य उपलब्ध होते हैं । वे यूप आदि याग के अंग होते हैं । जैसे यह वाक्य यूप की आदित्य रूप से प्रशंसा करता हुआ विधि का अंग है । वैसे ही तत्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि इत्यादि ज्ञान काण्ड के अन्तर अभेद विषयक विधि के अंग कैसे हो सकते हैं ? विश्वरूप मण्डन मिश्र कहते हैं - हे भगवन ! उपनिषद में मनो ब्रह्मेत्युपासीत { मन ब्रह्म है, ऐसी उपासना करें }  अन्नं उपास्य इत्यादि वाक्य कर्म की समृद्धि के लिए मन, अन्न तथा आदित्यादि वस्तुओं को ब्रह्म मानकर उपासना का उपदेश देते हैं । अर्थात इनकी ब्रह्म रूप से उपासना करनी चाहिए । इस प्रकार उपासना युक्त कर्म का फल अधिक होता है । जैसे ये उपासना के वाक्य हैं ? उसी प्रकार तत्वमसि आदि वाक्य भी जीव में ब्रह्म दृष्टि करने का उपदेश करते हैं । अभेद नही । अतः ये भी विधायक वाक्य हैं । आचार्य शंकर देशिक कहते हैं - हे मनीषी ! यह ठीक नहीं है । क्योँकि जिन वाक्यों का आपने उदाहरण दिया है । उनमें उपासीत { उपासना करे } इस प्रकार लिङ्ग लोट आदि के सूचक पद हैं । जिससे इन वाक्यों को विधि का अंग मानना युक्त है ।  परन्तु तत्वमसि वाक्य में लिङ्ग आदि सूचक कोई पद भी नहीं है । किन्तु असि क्रियावाचक पद वर्तमान काल का बोध कराता है । इसलिये उपासना को नहीं कहता । जिससे विधि का अंग हो । 
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email