16 अप्रैल 2011

आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ 15

नारायण ! कामशास्त्र को भली भाँति जानते भी सर्वज्ञ शंकर देशिकेन्द्र संन्यासियों के नियम रक्षार्थ कामशास्त्र अनभिज्ञ की तरह उभय भारती { शारदा } से बोले - आप मुझे इस विषय में एक मास की अवधि दीजिए ( कहीं कहीं 6 मास की अवधि लिखी पाई जाती है ) वादी लोग अवधि देने की प्रथा को मानते हैं । हे सुन्दरी ! उसके पश्चात तुम कामशास्त्र में अपनी निपुणता छोड़ देगी । एवमस्तु ! इस प्रकार उभय भारती ने स्वीकार कर लिया ।
तब योगीराज आचार्य शंकर देशिकेन्द्र अपने विद्वान शिष्यों के साथ योगबल से आकाश में भ्रमण करने लगे । उन्होंने किसी स्थान पर स्वर्ग से गिरे देवताओं के समान प्रलाप करती युवती स्त्रियों से घिरे दुखी मन्त्रियों से युक्त किसी मृतक राजा को देखा । रात में शिकार करने उस जंगल में आये थे । उस मृतक अमरुक राजा को देख यतिन्द्र शंकर अपने शिष्य सनन्दन { पद्मपाद } से बोले - जिसके घर में सौन्दर्य तथा सौभाग्य के आश्रयभूत सौ से अधिक सुन्दरियाँ निवास करती है । वही यह अमरुक राजा है ।
प्रविश्य कायं तमिमं परासोर्नृपस्य राज्येऽस्य सुतं निवेश्य ।
योगानुभावात्पुनरप्युपैतुमुत्कण्ठते मानसमस्मदीयम ।
हे सनन्दन ! सर्वज्ञता के निर्वाहरार्थ मेरा मन इस मृत राजा के शरीर में प्रवेश कर तथा सिंहासन पर इसके पुत्र को बैठाकर योग के प्रभाव से फिर लौट आने के लिए उत्कुण्ठित हो रहा है ।
इस प्रकार कहने पर उन यति प्रवर आचार्य शंकर से सनन्दन बड़े ही शान्ति से बोले - हे सर्वज्ञ ! आपको कोई विषय अज्ञात नहीं । तथापि यह यति के लिए उचित नहीं है ।
आचार्य शंकर पद्मपाद के वचन को सुनकर बृहस्पति के समान बोले - आपके वचन अत्यन्त प्रशंसनीय हैं । तो भी हे सोम्य ! मैं परमार्थ वचन
कहता हूँ । उसे सावधान होकर सुनो -
संकल्प एवाखिलकाममूलं स एव मे नास्ति समस्य विष्णोः ।
तन्मूलहानौ भवपाशनाशः कर्तुः सदा स्याद्भवदोषदृष्टेः ।
अविचार्य यस्तु वपुरद्यहमित्यभिमन्यते जडमतिः सुदृढम ।
तमबुद्धतत्त्वमधिकृत्य विधिप्रतिषेधशस्त्रमखिलं सफलम ।
- संकल्प ही सब इच्छाओं का मूल है । वह कृष्ण के समान मुझमें नहीं है । संसार के पदार्थोँ में सदैव दोष दृष्टि रखने वाला पुरुष यदि किसी कार्य का कर्ता भी हो । तो भी उसे काम के मूल संकल्प के निवृत्त होने पर संसार बन्धन नहीं होता । जो जड़ बुद्धि पुरुष विना विचार के आत्म शरीर आदि में दृढ़ अहं अभिमान करता है । तत्व को न जानने वाले उस पुरुष को अधिकृत कर समस्त विधि निषेध शास्त्र सार्थक होता है ।
अर्थात - सर्वकामो यजेत, न सुरां पिवेत इत्यादि विधि निषेध शास्त्र अविद्वान को ही आश्रित कर प्रवृत्त होता है ।
तस्मादविद्यावद्विषयाण्णेव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि च
{ ब्रह्मसूत्र शाङ्कर भाष्यम 1 सूत्र } में भी वर्णन है ।
वेदान्त महा वाक्यों से उत्पन्न बुद्धि वाला पुरुष ब्रह्मचार्यादि आश्रमहीन, ब्राह्मणादि वर्ण रहित, मनुष्यत्वादि जातिहीन ज्ञान मात्र, अज एक रस
आत्मा को अपना ही स्वरूप जानकर वेद के अत्युत्तम उपदेशों अर्थात वेदान्त उपदेशों में रमण करने वाला वह विद्वान विधि निषेध का दास
नहीं बनता । तत्र को विधिः को निषेधः । ऐसी श्रुति भी है ।
घट आदि मृत्तिका से उत्पन्न हुए हैं । जैसे ये मृत्तिका से भिन्न नहीं हैं । अर्थात इनकी मृत्तिका से भिन्न सत्ता नहीं हैं । वैसे ही परमात्मा से उत्पन्न हुआ यह जगत भी परमात्मा के विना त्रिकाल में नहीं है ।
अर्थात इसकी पृथक सत्ता नहीं है । मिथ्या है । 
वाचाऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम { घट आदि कार्य वाणी कथन मात्र है । सत्य तो केवल मृत्तिका ही है । } यह श्रुति की उदघोषणा है । कल्पित की अधिष्ठान से पृथक सत्ता नहीं होती । इस विषय में तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः { ब्रह्मसूत्रम 2/1/14 } इस सूत्र का शंकर भाष्यम भी देखा जाये ।
यह सम्पूर्ण जगत मिथ्या है । इस प्रकार हृदय में अनुसंधान करने वाला पुरुष कर्म फलों से किसी प्रकार भी लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार स्वप्न काल में किये गये पुण्य पाप जागने पर मिथ्या बुद्धि से नष्ट होने के कारण कदाचिदपि शुभाशुभ फल के लिए नहीं होते । चाहे वह सौ अश्वमेध यज्ञ करे । अथवा चाहे अगणित ब्राह्मणों की हत्या करे । तो भी परमार्थ तत्व को जानने वाला पुरुष सुकृत और दुष्कृत से लिप्त नहीं होता । यह काण्ववचन है ।
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