23 अप्रैल 2011

आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ 3

नारायण ! पण्डितवर मण्डन मिश्र के विशाल भवन में शास्त्रार्थ का आयोजन किया गया । बहुत से विद्वान तथा पण्डित लोग उत्साह के साथ शास्त्रार्थ सभा मण्डप में श्रोता के रूप में उपस्थित हुए । आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के आग्रह से उभय भारती { शारदा }  ने मध्यस्थ पद को सुशोभित किया । पत्या नियुक्ता पति देवता सा सदस्यभावे सुदती चकाशे । तयोर्विवेक्तुं श्रुततारतम्यं समागता संसदि भारतीय । अर्थात पति के द्वारा मध्यस्थ बनने के लिए आग्रह किये जाने पर सुन्दरी शारदा देवी ने वह पद ग्रहण किया । उनकी शोभा देखने योग्य थी । ऐसा लगता था । मानों दोनों विद्वानों के शास्त्रार्थ के तारतम्य का निर्णय करने के लिए स्वयं सरस्वती समा मण्डप में पधारी हो । यह नारी जाति के लिए महान गौरव की बात थी । इसी प्रकार भारतीय संस्कृति में योग्य नारियों का समाज में सम्मानित स्थान रहा है । आचार्य शंकर की प्रतिज्ञा - ब्रैह्मैकं परमार्थसिच्चिदमलं विश्वप्रपञ्चात्मना शुक्ती रूप्यपरात्मनेव बहलाज्ञानावृतं भासते । तज्ज्ञानान्निखिलप्रपञ्चनिलया त्वात्मव्यवस्थापर निर्वाणं जनिमुक्तमम्युपगतं मानं श्रुतेर्मस्तकम । शंकर ने प्रतिज्ञा किया -ब्रह्म 1 सत चिद निर्मल तथा परमार्थ है । जैसे मिथ्या ज्ञान से सीप रजत रूप में भासती है । वैसे ही सत, चिद आनन्द स्वरूप ब्रह्म मिथ्या अनादि अज्ञान से इस दृश्यमान प्रपञ्च रूप से भासित होता है । जब इसे तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि आदि उपनिषद वाक्यों द्वारा जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान उत्पन्न होता है । तब अनादि कारण मिथ्या ज्ञान सहित यह समस्त प्रपञ्च निवृत्त हो जाता है । और यह अपने असली चिन्मय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जन्म मरण से रहित होकर मुक्त हो जाता है । यही हमारा सिद्धांत है । इसमें उपनिषद प्रमाण है । मैं फिर अपने इस कथन को दुहराता हूँ । जीवब्रह्मैक्य { जीव ब्रह्म 1 है } मेरा विषय है । उसमें उपनिषद वाक्य प्रमाण हैं । एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म { छान्दोग्य 6/2/1 } सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म { तैतरेय 2/1/1 } सर्वँ खल्विदं ब्रह्म { छान्दोग्य 3/14/1 } विज्ञानमानन्दं ब्रह्म { बृहदारण्यक 3/9/28 } ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति । ब्रह्मविदाप्नोति परम । वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृतिकेत्येव सत्यम । तत्र को मोहः कः शोकः एकात्मनुपश्यतः इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं । आचार्य आगे कहते हैं - बाढं जये यदि पराजयभागहं स्यां संन्यासमङ्ग परिहृत्य कषायचैलम । शुक्लं वसीय वसनं द्वयभारतीयं वादे जयाजयफलप्रतिदीपिकास्तु । जय निश्चित होने पर भी यदि मैं इस विवाद में पराजय का भागी हुआ । तो हे प्रिय ! इस कषाय वस्त्रों सहित संन्यास को छोड़कर श्वेत वस्त्र धारण करूँगा । इस विवाद में जय तथा पराजय रूप फल की निर्णायक यह उभय भारती हो । यति श्रेष्ठ शंकर के द्वारा इस प्रकार अपनी उदार { जीव ब्रह्मैक्य } प्रतिज्ञा किये जाने पर गृहस्थ श्रेष्ठ विश्व रूप मण्डन मिश्र ने भी अपने मत की प्रतिष्ठापक प्रतिज्ञा की । मण्डन मिश्र की प्रतिज्ञा - वेदान्ता न प्रमाणं चितिवपुषि पदे तत्र सङ्गात्ययोगात पूर्वो भागः प्रमाणं पदचयगमिते कार्यवस्तुन्यशेषे । शब्दानां कार्यमात्रं प्रति समधिगता शक्तिरभ्युन्नतानां कर्मभ्यो मुक्तिरिष्टा तदिह तनुभृतामाऽऽयुषः स्यात्समाप्तेः । मण्डन मिश्र ने प्रतिज्ञा की - चैतन्य रूप ब्रह्म के प्रतिपादन करने में वेदान्त उपनिषद प्रमाण नहीं है । क्योंकि कार्यान्वित चिद्रूप सिद्ध वस्तु में शक्ति का योग नहीं है । अर्थात सिद्ध वस्तु के प्रतिपादन में वेदान्त वाक्यों का तात्पर्य नहीं है । जैसे घट पट आदि सिद्ध वस्तु के बोधन कराने में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । किन्तु वेदान्त से पूर्व भाग कर्म काण्ड पद समुदायात्मक वाक्यों के द्वारा समस्त कार्य वस्तु के बोधित कराने में प्रमाण है । घट मानय { घट ले आओ }  इत्यादि प्रसिद्ध शब्दों की शक्ति आनय आदि कार्य मात्र में समधिगत है । कर्मोँ से ही मुक्ति अभिगत है । इसलिए इस लोक में मनुष्य को आयु पर्यन्त कर्मोँ का अनुष्ठान करना चाहिए । आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम { जैमिनि सूत्र 1/2/1 } यह मीमांसा का मुख्य सिद्धान्त है कि वेद याग आदि क्रिया परक है । जो वेद भाग याग आदि क्रियाओं को नहीं करता । वह निष्फल है । स्वर्गकामो यजेत स्वर्ग काम पुरुष याग करे । यह विधि है । जो वेद वाक्य कर्म का प्रतिपादन नहीं करते । वे भी अर्थवाद रूप से साक्षात वा परम्परया विधि से ही सम्बन्धित है । कुर्वन्नेवेह कर्मार्णि जिजिविषेच्छत समाः { ईश } कर्म करते हुए 100 वर्ष जीने की इच्छा करे । इस प्रकार श्रुति आदि प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि वेद मन्त्रों का कर्म में तात्पर्य है । ब्रह्म में नहीं । मण्डन कहते हैं - वादे कृतेऽस्मिध्यदि मे जयान्यस्त्वयोदितात्स्याद्विपरीतभावः । येयं त्वयाऽभूद्गदिता प्रसाक्ष्ये जानाति चेत्सा भविता बधूर्मे । अर्थात इस वाद के करने पर यदि मेरा पराजय हुआ । तो आपसे कहे हुए से विपरीत भाव शुक्ल वस्त्र गृहस्थाश्रम को छोड़कर कषाय वस्त्रों को धारण करूँगा । जिन मेरी पत्नी उभय भारती को आपने शास्त्रार्थ में मध्यस्थ बनाया है । उसे मैं स्वीकार करता हूँ । नारायण ! इस प्रकार यतिन्द्र शङ्कर शंकर और विश्व रूप ने आपस में यह प्रतिज्ञा की कि पराजित व्यक्ति जीतने वाले व्यक्ति के आश्रम का ग्रहण करे । अनन्तर विजय में स्थापित दृष्टि वाले दोनों ने उदार बुद्धि वाली उभय भारती को मध्यस्थ पद पर अभिषिक्त कर विजय की कामना से शास्त्रवाद का आरम्भ किया । दोनों अपने आवश्यक कृत्य समाप्त कर शास्त्रार्थ करने के लिए अपने अपने निश्चित स्थान पर आ बैठे । तब उभय भारती ने उनके कण्ठ में पुष्पमाला पहना कर यह घोषणा कर दी - माला यदा मलिनभावमुपैति कण्ठे यस्यापि तस्य विजयेतरनिश्चयः स्यात । उक्त्वा गृहं गतवती गृहकर्मसक्ता भिक्षाशनेऽपि चरितुं गृहिमस्करिभ्याम । अर्थात जिसके भी कण्ठ की माला जब मलिन हो जायेगी । तब उसी का निश्चित पराजय समझा जायगा । गृह कार्य में संलग्न उभय भारती ने ऐसा कहकर घर चली गई । क्योंकि अपने पति के लिए भोजन और संन्यासी के लिए भिक्षा तैयार करनी थी । नारायण ! एक दूसरे पर विजयात्मक फल में आदर रखने वाले दोनों ने विवाद के निर्णय के लिए वाद का विस्तार किया । अर्थात दोनों विवाद में लगे रहे । इस शास्त्रार्थ की इतनी प्रसिद्ध हो गई कि ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता लोग भी अपने अपने वाहन पर बैठकर सुनने के लिए उसी सदन के ऊपर स्थित हुए । ब्रह्मा आदि देवताओं की उपस्थिति के अनन्तर दोनों में महान शास्त्रार्थ आरम्भ हुआ । बीच बीच में सभ्य लोग उन्हें साधुवाद देकर उत्साह बढ़ाने लगे । अपने पक्ष के लिए दोनों ने समस्त वेद की साक्षी प्रमाण माना । दोनों परस्पर प्रसन्न होते रहे । दिन प्रतिदिन शास्त्रार्थ उत्कृष्ट तथा गंभीर होने लगा । इसके सुनने के लिए दूर दूर की पण्डित मण्डली जुटने लगी । एक दूसरे को पराजित करने के लिए पूरा प्रयत्न कर रहे थे । लेकिन इस शास्त्रार्थ में 1 श्लाधनीय बात यह थी कि दोनों वादी प्रतिवादी बड़े प्रेम भाव से साधु शब्दों का प्रयोग कर रहे थे । कभी क्लान्त मन नहीं होते । न उनकी वाणी तथा स्वरादि में शिथिलता प्रतीत होती । धारावाहिक प्रश्नोत्तर की झड़ी चल रही थी । मध्यस्थ उभय भारती प्रतिदिन मध्याह्न काल में आकर अपने पति को कहती कि भोजन का समय हो गया है । और यति शंकर को कहती - भिक्षा का समय हो गया है । इसी प्रकार 5-6 दिन बीत गये । शास्त्रार्थ में दोनों के मुख मण्डल विकसित थे । तथा होठों पर मधुर मन्द मन्द मुस्कान थी । न शरीर में पसीना होता । न कम्प होता । न वे आकाश की ओर देखते । अपितु सावधान मन एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर बड़ी प्रगल्भता से देते । न वे निरुत्तर होने पर क्रोध से बाक्छल का प्रयोग करते थे । अनन्तर यतिराज ने विलक्षण मण्डन मिश्र के शास्त्र कौशल को देखकर उनके सब पक्षों का खण्डन कर दिया । और और विद्वानों के समक्ष उन्हें प्रतिभा हीन बना डाला । अर्थात शंकर ने मण्डन मिश्र को इस बात पर निरुत्तर कर दिया कि वेदान्त वाक्य भी कर्म प्रतिपादक वाक्यों के समान याग आदि क्रियाओं को कहते हैं । ब्रह्म को नहीं । आचार्य ने श्रुति प्रमाण से यह सिद्ध कर दिया - वेदान्त ब्रह्म में प्रमाण है । कर्म में नहीं । इस प्रकार सभ्यों में श्रेष्ठ मण्डन मिश्र जब अपने सिद्धान्त के समर्थन करने में असमर्थ हो गये । तब वेदान्त वाक्यों से प्रसिद्ध अद्वैत सिद्ध करने में असमर्थ हो गये । तब वेदान्त वाक्यों से प्रसिद्ध अद्वैत सिद्धान्त के खण्डन करने की इच्छा से बोले - भो भो यतिक्ष्माधिपते भवद्भिर्जीवेशयोर्वास्तवमैकरूप्यम । विशुद्धमङ्गीक्रियते हि तत्र प्रमाणमेव न वयं प्रतीमः । 
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email