03 अप्रैल 2011

इस स्वप्न को समझने की कोशिश करो

आपने जैसे मुझे मेरे पिछले स्वप्न से जगाया । मैं उसका बिलकुल गलत अर्थ किए बैठा था । वैसे ही इस स्वप्न के बारे में भी कुछ कहने की कृपा करें । पहले मैं अक्सर स्वप्न देखता था कि भीड़ में, सभा में, समाज में अचानक नग्न हो गया हूं । और उससे मैं बहुत चौंक उठता था । लेकिन संन्यास लेने के पश्चात वैसा स्वप्न आना बंद हो गया है । वर्ष भर से मैं अनेक बार स्वप्न में अपने को गैर गैरिक वस्त्रों में देखता हूं । और अपने को वैसा देखकर भी मैं बहुत चौंक उठता हूं । उल्लेखनीय है कि अब तो मैं गैरिक वस्त्र स्वेच्छा, आनंद और कृतज्ञता के भाव से पहनता हूं । मैंने जो कुछ पाया है । उसे बांटने में यह रंग बहुत सहयोगी साबित हुआ है । फिर यह स्वप्न क्या सूचित करता है ? पूछा है - अजित सरस्वती ने ।
- इस स्‍वप्‍न को समझने के लिए आधुनिक मनोविज्ञान को कार्ल गुस्ताव का के द्वारा दी गई 1 धारणा समझनी होगी । कार्ल गुस्ताव का ने उस धारणा को " दि शैडो " छाया व्यक्तित्व कहा है । वह बड़ी महत्वपूर्ण धारणा है । जैसे तुम धूप में चलते हो । तो तुम्हारी छाया बनती है । ठीक ऐसे ही तुम जो भी करते हो । उसकी भी तुम्हारे भीतर छाया बनती है । वह छाया विपरीत होती है । वह छाया सदा तुमसे विपरीत होती है । और जीवन का नियम है कि यहां सभी चीजें विपरीत से चलती हैं । यहां स्त्री चलती है । तो पुरुष के बिना नहीं चल सकती । यहां पुरुष चलता है । तो स्त्री के बिना नहीं चल सकता । यहां रात है । तो दिन है । और यहां जन्म है । तो मौत है । यहां अंधेरा है । तो प्रकाश है । यहां हर चीज अपने विपरीत से बंधी है । जगत द्वंद्व है - द्वैत, द्वि । ठीक ऐसी ही स्थिति मन के भीतर है । अब इस स्वप्न को समझने की कोशिश करो । कहा है कि - पहले स्वप्न देखता था । भीड़ में, सभा में, समाज में अचानक नग्न हो गया हूं । वह छाया है । तुम वस्त्र पहन कर समाज में, भीड़ में, व्यक्तियों में मिलते जुलते हो । तुम्हारी छाया उससे विपरीत भाव पैदा करती रहती है । नग्न हो जाने का । इसलिए अक्सर जब कभी कोई आदमी पागल हो जाता है । तो वस्त्र फेंककर नग्न हो जाता है । जो छाया सदा से कह रही थी । और उसने कभी नहीं सुना था । पागल होकर वह छाया के साथ राजी हो जाता है । जो उसने किया था । उसे छोड़ देता है । और छाया की सुनने लगता है । उसका छाया रूप सदा से कह रहा था - हो जाओ नग्न । हो जाओ नग्न । इसलिए तो समाज इतने जोर से आग्रह करता है कि - नग्न मत होना । नग्न मत निकलना बाहर । क्योंकि सभी को पता है । जिस दिन से आदमी ने वस्त्र पहने हैं । उसी दिन से नग्न होने की कामना छाया रूप व्यक्तित्व में पैदा हो गई है । जिस दिन से वस्त्र पहने हैं - उसी दिन से ।
जो लोग नग्न रहते हैं जंगलों में । उनको कभी ऐसा सपना नहीं आएगा । सपने में वे कभी नहीं देखेंगे कि वे नग्न हो गए हैं । क्योंकि वस्त्र उन्होंने पहने नहीं । हाँ सपने में वस्त्र पहनने का सपना आ सकता है । अगर उन्होंने वस्त्र पहने हुए लोग देखे हैं । तो सपने में वस्त्र पहनने की आकांक्षा पैदा हो सकती है । सपने में हम वही देखते हैं । जो हमने इंकार किया है । जो हमने अस्वीकार किया है । जो हमने त्याग दिया है । सपने में वही हमारे मन में उठने लगता है । जो हमने घर के तलघरे में फेंक दिया है । और जब भी हम कोई काम करेंगे । तो कुछ तो तलघरे में फेंकना ही पड़ेगा । अगर तुमने किसी स्त्री को प्रेम किया । तो प्रेम के साथ जुड़ी हुई घृणा को क्या करोगे ? घृणा को तलघरे में फेंक दोगे । तुम्हारे सपने में घृणा आने लगेगी । तुम्हारे सपने में तुम किसी दिन अपनी पत्नी की हत्या कर दोगे । किसी दिन तुम सपने में पत्नी की गर्दन दबा रहे होओगे । और तुम सोच भी न सकोगे कि - कभी ऐसा सोचा नहीं । जागते में कभी विचार नहीं आया । और पत्नी इतनी सुंदर है । और इतनी प्रीतिकर है । और सब ठीक चल रहा है । यह सपना कैसे पैदा होता है ? तुम कभी सपने में मित्र के साथ लड़ते हुए पाए जाओगे । क्योंकि जिससे भी तुमने मैत्री बनाई । उसके साथ जो शत्रुता का भाव उठा । उसे तुमने तलघरे में फेंक दिया । हम 24 घंटे कुछ करते हैं । तो तलघरे में फेंकते हैं । इसलिए तो अष्टावक्र तो कहते हैं कि - तुम न तो चुनना पुण्य को । न पाप को । तुमने पुण्य चुना । तो पाप को तलघरे में फेंक दोगे । वह तुम्हारे सपनों में छाया डालेगा । और वह तुम्हारे आने वाले जीवन का आधार बन जाएगा । अगर तुमने चुना पाप को । तो तुम पुण्य को तलघरे में फेंकोगे । फर्क ही क्या है ? जिसको हम पुण्यात्मा कहते हैं । उस आदमी ने पाप को भीतर दबा लिया है । पुण्य को बाहर प्रगट कर दिया है । जिसको हम पापी कहते हैं । उसने उल्टा किया है । पुण्य को भीतर दबा लिया । पाप को बाहर प्रगट कर दिया । लेकिन सभी चीजें दोहरी हैं । जैसी सिक्के के 2 पहलू हैं ।
तो जब पहले स्वप्न देखता था - भीड़ में, सभा में, समाज में । तो देखता था । अचानक नग्न हो गया हूं । जिस दिन पहली दफा अजित को मां बाप ने वस्त्र पहनाए होंगे । उसी दिन छाया पैदा हो गई । बच्चे पसंद नहीं करते वस्त्र पहनना । उनको जबर्दस्ती सिखाना पड़ता है । धमकाना पड़ता है । रिश्वत देनी पड़ती है कि मिठाई देंगे कि यह टाफी ले लो कि यह चाकलेट ले लो कि इतने पैसे देंगे । मगर कपड़े पहन कर बाहर निकलो । तो बच्चे के मन में तो नग्न होने का मजा होता है । क्योंकि बच्चा तो जंगली है । वह तो आदिम है । वह कोई कारण नहीं देखता कि क्यों कपड़े पहनो ? कोई वजह नहीं है । और कपड़े के बिना इतनी स्वतंत्रता और मुक्ति मालूम होती है । नाहक कपड़े में बंधों । और फिर झंझटें कपड़े के साथ आती हैं कि तुम कपड़ा फाड़कर आ गए कि मिट्टी लगा लाए । अब यह बड़े मजे की बात है कि यही लोग कपड़ा पहनाते हैं । और यही लोग फिर कहते हैं कि अब कपड़े को साफ सुथरा रखो । अब इसको गंदा मत करो । उसने कभी पहनना नहीं चाहा था । 1 मुसीबत दूसरी मुसीबत लाती है । फिर सिलसिला बढ़ता चला जाता है । फिर अच्छे कपड़े पहनो । फिर सुंदर कपड़े पहनो । फिर सुसंस्कृत कपड़े पहनो । प्रतिष्ठा योग्य । फिर यह जाल बढ़ता जाता है । धीरे धीरे वह जो मन में बचपन में नग्न होने की स्वतंत्रता थी । वह तलघर में पड़ जाती है । वह कभी कभी सपनों में छाया डालेगी । वह कभी कभी कहेगी कि क्या उलझन में पड़े हो । कैसा मजा था तब । कूदते थे । नाचते थे । पानी में उतर गए । तो फिक्र नहीं । वर्षा हो गई । तो खड़े हैं । फिक्र नहीं । रेत में लोटे । तो फिक्र नहीं । इन कपड़ों ने तो जान ले ली । इन कपड़ों से मिला तो कुछ भी नहीं है । खोया बहुत कुछ ।
तो वह भीतर दबी हुई आकांक्षा उठ आती होगी । वह कहती है - छोड़ दो । अब तो छोड़ो । बहुत हो गया । क्या पाया ? वस्त्र ही वस्त्र रह गए । आत्मा तो गंवा दी । स्वतंत्रता गंवा दी । इसलिए सपने में नग्न हो जाते रहे होओगे । फिर पूछा है कि - जब से संन्यास लिया । वैसा स्वप्न आना बंद हो गया । साफ है प्रतीक । संन्यास तुमने लिया । मां बाप ने नहीं दिलवाया । कपड़े मां बाप ने पहनाए थे । तुम पर किसी न किसी तरह की जबर्दस्ती हुई होगी । यह संन्यास तुमने स्वेच्छा से लिया । यह तुमने अपने आनंद से लिया । ये वस्त्र तुमने अपने प्रेम से चुने । तुमने अहोभाव से चुने । निश्चित ही इन वस्त्रों से तुम्हारा जैसा मोह है । वैसा दूसरे वस्त्रों से नहीं था । इन वस्त्रों से जैसा तुम्हारा लगांव है । वैसा दूसरे वस्त्रों से नहीं था । इसलिए नग्नता का स्वप्न तो विलीन हो गया । वह पर्दा गिरा । वह बात खत्म हो गई । वे वस्त्र ही तुमने गिरा दिए । जिनके कारण नग्नता का स्वप्न आता था । उन्हीं वस्त्रों से जुड़ा था नग्नता का स्वप्न । जो तुम्हें जबर्दस्ती पहनाए गए थे । अब उस स्वप्न की कोई सार्थकता न रही । जब वे वस्त्र ही चले गए । तो उन वस्त्रों के कारण जो छाया पैदा हुई थी । वह छाया भी विदा हो गई । सिक्के का 1 पहलू चला गया । दूसरा पहलू भी चला गया । अब तुमने खुद अपनी इच्छा से वस्त्र चुने हैं । इसलिए नग्न होने का भाव तो पैदा नहीं होता । लेकिन कभी कभी गैर गैरिक वस्त्रों में अपने को सपने में देखता हूं ।
अब यह थोड़ा समझने जैसा है । यद्यपि इन वस्त्रों के साथ वैसा विरोध नहीं है । जैसा कि मां बाप के द्वारा पहनाए गए वस्त्रों के साथ था । यह तुमने अपनी मर्जी से चुना है । लेकिन फिर भी, जो भी चुना है । उसकी भी छाया बनेगी । धूमिल होगी छाया । उतनी प्रगाढ़ न होगी । जो तुम्हें जबर्दस्ती चुनवाया गया था । तो उसकी छाया बड़ी मजबूत होगी । जो तुमने अपनी स्वेच्छा से चुना है । उसकी छाया बहुत मद्धिम होगी । मगर होगी तो । क्योंकि जो भी हमने चुना है । उसकी छाया बनेगी । वह स्वेच्छा से चुना है । या जबर्दस्ती चुनवाया गया है । यह बात गौण है । चुनाव की छाया बनेगी । सिर्फ अचुनाव की छाया नहीं बनती । सिर्फ साक्षी भाव की छाया नहीं बनती । कर्तृत्व की तो छाया बनेगी ।
यह संन्यास भी कर्तृत्व है । यह तुमने सोचा । विचारा । चुना । इसमें आनंद भी पाया । लेकिन स्वप्न बड़ी सूचना दे रहा है । स्वप्न यह कह रहा है कि - अब कर्ता के भी ऊपर उठो । अब साक्षी बनो ।
साक्षी बनते ही स्वप्न खो जाते हैं । तुम यह चकित होओगे जानकर । वस्तुत: कोई व्यक्ति साक्षी बना । या नहीं । इसकी 1 ही कसौटी है कि - उसके स्वप्न खो गए या नहीं ? जब तक हम कर्ता हैं । तब तक स्वप्न चलते रहेंगे । क्योंकि करने का मतलब है । कुछ हम चुनेंगे ।
अब समझो । अजित ने जब संन्यास लिया । तो एकदम से कपड़े नहीं पहने । अजित ने जब संन्यास लिया शुरू में । तो ऊपर का शर्ट बदल लिया । नीचे का पैंट वे सफेद ही पहनते रहे । द्वंद्व रहा होगा । मन कहता होगा - क्या कर रहे घर है । परिवार है । व्यवसाय है । अजित डाक्टर हैं । प्रतिष्ठित डाक्टर हैं । धंधे को नुकसान पहुंचेगा । लोग समझेंगे । पागल हैं । यह डाक्टर को क्या हो गया ? माला भी पहनते थे । तो भीतर छिपाए रखते थे । अब मुझसे छुपाया नहीं जा सकता । जो जो भीतर छुपा रहे हैं । वे खयाल रखना । उसको भीतर छुपाए रखते थे । फिर धीरे धीरे हिम्मत जुटाई । माला बाहर आई । जब भी मुझे मिलते । तो मैं उनसे कहता रहता कि - अब कब तक ऐसा करोगे ? अब यह पैंट भी गेरुआ कर डालो । वे कहते - करूंगा, करूंगा । धीरे धीरे ऐसा कोई 2-3    साल लगे होंगे । तो 2-3   साल जो मन डावांडोल रहा । उसकी छाया है भीतर । चुना इतने दिनों में । सोच सोचकर चुना । धीरे धीरे पिघले । समझ में आया । फिर पूरे गैरिक वस्त्रों में चले गए । लेकिन वह जो 3 साल डावांडोल चित्त दशा रही । चुनें कि न चुनें । आधा चुनें । आधा न चुनें । उस सबकी भीतर रेखाएं छूट गईं । वही रेखाएं स्वप्नों में प्रतिबिंब बनाएंगी । जो भी हम चुनेंगे । चुनाव का मतलब यह होता है । किसी के विपरीत चुनेंगे । जो कपड़े वे पहने थे । उनके विपरीत उन्होंने गेरुए वस्त्र चुने । तो जिसके विपरीत चुने । वह बदला लेगा । जिसके विपरीत चुने । वह प्रतिशोध लेगा । वह भीतर बैठा बैठा राह देखेगा कि कभी कोई मौका मिल जाए । तो मैं बदला ले लूं । अगर सामान्य जिंदगी में मौका न मिलेगा । कुछ को मिल जाता है । जैसे 'स्वभाव' कल या परसों अपना साधारण कपड़े पहने हुए यहां बैठे थे । तो स्वभाव को सपना नहीं आएगा । यह बात पक्की है । सपने की कोई जरूरत नहीं है । वे बेईमानी जागने में ही कर जाते हैं । अब सपने की क्या जरूरत है । तुम जब धोखा जागने में ही दे देते हो । तो फिर सपने का कोई सवाल नहीं रह जाता । स्वभाव को सपना नहीं आने वाला । मगर यह उनका दुर्भाग्य है । यह अजित का सौभाग्य है कि सपना आ रहा है । इससे 1 बात पक्की है कि जागने में धोखा नहीं चल रहा हैं । तो सपने में छाया बन रही है । अब इस सपने की छाया के भी पार जाना है । इसके पार जाने का 1 ही उपाय है । इसे स्वीकार कर लो । इसे सदभाव से स्वीकार कर लो कि संन्यास मैंने चुना था । इसे बोधपूर्वक अंगीकार कर लो कि संन्यास मैंने चुना था । पुराने कपड़ों से लड़ लड़कर चुना था । तो पुराने कपड़ों के प्रति कहीं कोई दबी आसक्ति भीतर रह गई है । उसे स्वीकार कर लो कि वह आसक्ति थी । और मैंने उसके विपरीत चुना था । उसको स्वीकार करते ही स्वप्नों से वह तिरोहित हो जाएगी । लेकिन उसके स्वीकार करते ही तुम 1 नए आयाम में प्रविष्ट भी होगे । ये गैरिक वस्त्र गैरिक रहेंगे । लेकिन अब यह चुनाव जैसा न रहा । यह प्रसाद रूप हो जाएगा । इस फर्क को समझ लेना ।
अगर तुमने संन्यास मुझसे लिया है - प्रसाद रूप । तुमने मुझसे कहा कि - आप दे दें । अगर मुझे पात्र मानते हों । और तुमने कोई चुनाव नहीं किया । तो सपने में छाया नहीं बनेगी । अगर तुमने चुना । तुमने सोचा । सोचा । बारबार चिंतन किया । पक्ष विपक्ष देखा । तर्क वितर्क जुड़ाया । फिर तुमने संन्यास लिया । तो छाया बनेगी ।
अजित ने खूब सोच सोचकर संन्यास लिया । इसलिए छाया रह गई है । अब तुम संन्यास को प्रसाद रूप कर लो । अब तुम यह भाव ही छोड़ दो कि - मैंने लिया । अब तो तुम यही समझो कि तुम्हें दिया गया प्रभु  प्रसाद । प्रभु अनुकंपा । यह मेरा चुनाव नहीं । और जो तुम्हारे भीतर दबा हुआ भाव रह गया है । उसको भी अंगीकार कर लो कि - वह है । वह तुम्हारे अतीत में था । उसकी छाया रह गई है । स्वीकार करते ही धीरे से यह सपना विदा हो जाएगा । और संन्यास को प्रसाद रूप जानो । हालांकि चाहे तुमने सोच कर ही लिया हो । अगर तुम किसी दिन सत्य को समझोगे । तो तुम पाओगे । तुमने लिया नहीं । मैंने दिया ही है । कुरआन में 1 बड़ा अदभुत वचन है । वचन है कि फकीर कभी सम्राट या धनपतियों के द्वार पर न जाए । जब भी आना हो । सम्राट ही फकीर के द्वार पर आए । जलालुद्दीन रूमी बड़ा पहुंचा हुआ सिद्ध फकीर हुआ । उसे उसके शिष्यों ने देखा 1 दिन कि वह सम्राट के राजमहल गया । शिष्य बड़े बेचैन हुए । यह तो कुरआन का उल्लंघन हो गया । जब जलालुद्दीन वापिस लौटा । तो उन्होंने कहा कि - गुरुदेव, यह तो बात उल्लंघन हो गई । और आप जैसा सत्य पुरुष चूक करे ? कुरआन में साफ लिखा है कि कभी फकीर धनपति या राजाओं या राजनीतिज्ञों के द्वार पर न जाए । अगर राजा को आना हो । तो फकीर के द्वार पर आए । पता है । जलालुद्दीन ने क्या कहा । जो कहा । वह बड़ा अदभुत है । कुरआन के वचन की ऐसी व्याख्या ठीक कोई पहुंचा हुआ सिद्ध ही कर सकता है । जलालुद्दीन ने कहा - तुम इसकी फिक्र न करो । चाहे मैं जाऊं राजा के घर । चाहे राजा मेरे पास आए । हर हालत में राजा मेरे पास आता है । अजीब व्याख्या । हर हालत में । तुम आंखों की चिंता में मत पड़ना कि तुमने क्या देखा ? चाहे मैं राजा के महल जाता दिखाई पडूं । और चाहे राजा मेरे झोपड़े पर आता दिखाई पड़े । मैं तुमसे कहता हूं । हर हालत में राजा ही मेरे पास आता है । अब जलालुद्दीन कहते हैं । तो शिष्य सकते में आ गए । लेकिन बात तो समझ में नहीं आई कि - यह क्या मामला है । हर हालत में । जलालुद्दीन ने कहा - घबड़ाओ मत । परेशान मत होओ । कभी मैं राजा के द्वार पर जाता हूं । क्योंकि वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा आने की । वह तो नासमझ है । मैं तो नासमझ नहीं । मैं तो उसकी संभावना देखता हूं । मैं तो इसलिए गया कि उसके आने के लिए रास्ता बना आऊं । अब वह चला आएगा । मेरा जाना उससे अगर कुछ मांगने को होता । तो मैं गया । मैं तो देने गया था । तो जाना कैसा ? कुरआन यही कहता है कि - मत जाना । उसका कुल मतलब इतना है कि मांगने मत जाना । देने जाने के लिए तो कोई मनाही नहीं है । और जो देने गया है । वह गया ही नहीं है । मैं जलालुद्दीन से राजी हूं । मैं अजित सरस्वती को कहता हूं कि - तुमने सोच सोचकर संन्यास लिया । वह तुम्हारी समझ होगी । जहां तक मुझसे पूछते हो । मैंने दिया । तुम सोचते न । तो थोड़ी जल्दी मिल जाता । तुम सोचे । तो थोड़ी देर से मिला । बाकी हर हाल में दिया मैंने । जिन्होंने भी संन्यास लिया है । वे खयाल में ले लें कि तुम चाहे संन्यास लो । चाहे मैं दूं ? हर हाल में मैं देता हूं । तुम्हारे लेने का कोई सवाल नहीं है । तुम ले कैसे सकते हो ? तुम उस विराट की तरफ हाथ कैसे फैला सकते हो ? संन्यास प्रसाद है । और यह भाव जिस दिन समझ में आ जाएगा । उसी दिन यह स्वप्न खो जाएगा । इसमें थोड़ा कर्तृत्व भाव बचा है । उतनी ही अड़चन है ।
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