17 अप्रैल 2011

आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ 13

नारायण ।  मुनि जैमिनि मण्डन मिश्र को सम्बोधित करते  हुए कहते हैं -
हे यशस्वी ! मेरे वचनों से संदेह त्याग दो । इस  रहस्य को सुनो । संसार में निमग्न पुरुषों के  उद्धारार्थ शरीर धारण करने वाले आचार्य शंकर  को तुम शिव समझ ।
आद्ये सत्त्वमुनिः सतां वितरति ज्ञानं द्वितीय युगे  दत्तौ द्वापुरनामके तु सुमतिर्व्यासः कलौ शङ्करः ।  इत्येवं स्फुटमीरितोऽस्य महिमा शैवे पुराणे यत स्तस्य त्वं सुमते मते त्ववतरेः संसारवार्धि तरेः ।
अर्थात सतयुग में कपिल मुनि ने विद्वानों को ज्ञान  दिया । त्रेतायुग में दत्तात्रेय ने ।  द्वापर में सुमति व्यास  ने । और इस कलि में आचार्य शंकर ने  । इनकी महिमा शिव पुराण में वर्णित है । हे सुमते !  तुम इनके मत में प्रविष्ट होकर संसार समुद्र को पार कर ।
मण्डन मिश्र को सभा में इस प्रकार ज्ञान देकर  तपोमुनि जैमिनि आचार्य  शंकर को मन ही मन आलङ्गन कर अन्तर्धान हो गये ।  याज्ञिकों के सभा में प्रमुख मण्डन ने आचार्य  शंकर को प्रणाम कर कहा ।
विदितोऽस्ति संप्रति भवाञ्जगतः  प्रकृतिर्निरस्तसमस्तातिशयः ।
अवबोधमात्रवपुरप्यबुधोद्धरणाय केवलमुपासतनुः । 
हे भगवन ! अब मैंने आपको जान लिया । आप संसार  के कारण भूत हैं ।  समस्त विशेषों से रहित हैं । ज्ञान मात्र स्वरूप होते भी आपने अज्ञानियों के
उद्धारार्थ यह वपु धारण किया है । वस्तुतः आप  शरीर रहित हैं ।
हे यति राजेन्द्र ! आत्मा वा इदमेक एवाग्र  आसीत, ब्रह्म वा इदमग्र आसीत, सदेव सोम्येदमग्र आसीत, एकमेवाद्वितीयम इस प्रकार उपनिषद जिस एक अद्वितीय ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं । उसका तत्वमसि वाक्य आयुध है । और आप उसके  प्रतिपालक हैँ । यदि ऐसा न होता । तो वह ब्रह्म पथ  भ्रष्ट बौद्धों के प्रलाप रूपी अन्ध कूप में गिरकर न  जाने कब का प्रलय पा चुका होता ।
प्रबुद्धोऽहं स्वप्नादिति कृतमतिः स्वप्नमपरं   यथा मूढ़ं स्वप्ने कलयति तथा मोहवशगाः ।  विमुक्तिं मन्यते कतिचिदिहलोकान्तरगतिं  हसन्त्येतान्दा सास्तव गलितमायाः परगुरोः ।
प्रायः देखा जाता है कि मैं स्वप्न से जागा हुआ हूँ । यह विचार कर कोई मूढ़ व्यक्ति स्वप्न के भीतर एक दूसरे स्वप्न को देखता है । यही दशा कुछ अन्य
भक्तों की है । जो मोह के वशीभूत होकर लोकान्तर  गमन वैकुण्ठ प्राप्ति को मुक्ति मानते हैं ।  माया एवं मोह से रहित आप परम गुरु के दास ऐसे लोगों पर हंसते हैं । लोकान्तर प्राप्ति मात्र को मुक्ति मानना हास्यास्पद है ।
हे परमगुरो ! अविद्या रूपी राक्षसी ने अखिल विश्व के अधिपति ईश्वर को निगल डाला था । आपने उसके पेट को फाड़कर उसमें से ईश्वर को निकाल बाहर
किया है । हनुमान ने राक्षसियों से  घिरी सीता का केवल उद्धार किया । तो इतने से वे  लोक में पूज्य हो गये । तो उससे  भी आपकी महिमा कितनी अधिक होनी चाहिए । हे  जगत की पीड़ा को नष्ट करने वाले !  तुम्हारी इस प्रकार की अचिन्त्य महिमा को न जानकर  मैंने आपके समक्ष जो अनुचित बाते की हैं । हे
कृपासागर ! उन सबको आप क्षमा कर दें ।
अमित प्रतिभाशाली कपिल, कणाद, गौतम  आदि ऋषि लोग भी जिस श्रुति के अर्थ का निर्णय  करने में मोहित असमर्थ रहे । उसे भला परम शिव  के अंश भूत विना आपके और कौन समर्थ  हो सकता है ।
अल्प बुद्धि टीकाकारों की टीकाओं का प्रचार प्रबल  सर्पों के समान है । उनके काटने से श्रुतियां जर्जर हो गई हैं । यदि वे आपके वचन रूपी सुधा के सिंचन
से जीवित न हों । तो आत्मा में विश्वास रखने वाले  विद्वान लोग कैसे विहार कर सकते हैं ?
कर्म रूपी यन्त्र पर चढ़कर मैं तप, शास्त्र, घर, स्त्री, पुत्र, भृत्य तथा धन आदि में अभिमान  रखकर संसार रूप कूप में गिरा हुआ था । उससे आपने
मेरा उद्धार कर लिया । पूर्व जन्मार्जित अनन्त  पुण्यों के प्रभाव से मैंने आपके दर्शन का सौभाग्य  प्राप्त किया । तथा शास्त्रार्थ किया । अन्यथा यह सब कैसे हो सकता था ?  इसलिए मैं अपने पुत्र, स्त्री, घर, धन, गृहस्थाश्रम, कर्तव्य कर्म इन सबको छोड़कर आपके चरण की शरण आता हूँ । कृपया तत्व का उपदेश कीजिये । मैं आपका किंकर हूँ ।
।  इस प्रकार बुद्धिमान मण्डन मिश्र ने विनीत  तथा मधुर शब्दों से आचार्य  शंकर का वर्णन किया । जितेन्द्रिय शंकर ने मण्डन पर  दया दृष्टि करते उनकी स्त्री की ओर देखा । आचार्य के आशय को समझकर वह बोली ।
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