07 अप्रैल 2011

इनके भीतर बहुत ज्वालामुखी है

ऊबाऊपन - संसार में जितनी चीजें हैं । उनको पाने की चेष्टा में आदमी कभी नहीं ऊबता । पाकर ऊब जाता है । पाने की चेष्टा में कभी नहीं ऊबता । पाकर ऊब जाता है । इंतजार में कभी नहीं ऊबता । मिलन में ऊब जाता है । इंतजार जिंदगी भर चल सकता है । मिलन घड़ी भर चलाना मुश्किल पड़ जाता है । संसार के संयोग से जो तोड़ दे । दुख के संयोग से जो पृथक कर दे । अज्ञान से जो दूर हटा दे । ऐसे योग को अथक रूप से साधना कर्तव्य है । ऐसा कृष्ण कहते हैं । अथक रूप से । बिना थके । बिना ऊबे । इस बात को ठीक से समझ लें ।
मनुष्य का मन ऊबने में बड़ी जल्दी करता है । शायद मनुष्य के बुनियादी गुणों में ऊब जाना 1 गुण है । ऐसे भी पशुओं में कोई पशु ऊबता नहीं । बोर्डम । ऊब । मनुष्य का लक्षण है । कोई पशु ऊबता नहीं । आपने किसी भैंस को । किसी कुत्ते को । किसी गधे को ऊबता नहीं देखा होगा कि बोर्ड हो गया है । नहीं । कभी ऊब पैदा नहीं होती । अगर हम आदमी और जानवरों को अलग करने वाले गुणों की खोज करें । तो शायद ऊब 1 बुनियादी गुण है । जो आदमी को अलग करता है । आदमी बड़ी जल्दी ऊब जाता है । बड़ी जल्दी बोर्ड हो जाता है । किसी भी चीज से ऊब जाता है । बड़ी जल्दी बोर्ड हो जाता है । किसी भी चीज से ऊब जाता है । अगर सुख ही सुख मिलता जाए । तो तबियत होती है कि - थोड़ा दुख कहीं से जुटाओ । और आदमी जुटा लेता है । अगर सुख ही सुख मिले । तो तिक्त मालूम पड़ने लगता है । मुंह में स्वाद नहीं आता फिर । फिर थोड़ी सी कड़वी नीम मुंह पर रखनी अच्छी होती है । थोड़ा सा स्वाद आ जाता है । आदमी ऊबता है । सभी चीजों से ऊबता है । बड़े से बड़े महल में जाए । उनसे ऊब जाता है । सुंदर से सुंदर स्त्री मिले । सुंदर से सुंदर पुरूष मिले । उससे ऊब जाता है । धन मिले । अपार धन मिले । उससे ऊब जाता है । यश मिले । कीर्ति मिले । उससे ऊब जाता है । जो चीज मिल जाए । उससे ऊब जाता है । हां, जब तक न मिले । तब तक बड़ी सजगता दिखलाता है । बड़ी लगन दिखलाता है । मिलते ही ऊब जाता है । इस बात को ऐसा समझें । संसार में जितनी चीजें हैं । उनको पाने की चेष्टा में आदमी कभी नहीं ऊबता । पाकर ऊब जाता है । पाने की चेष्टा में कभी नहीं ऊबता । पाकर ऊब जाता है । इंतजार में कभी नहीं ऊबता । मिलन में ऊब जाता है । इंतजार जिंदगी भर चल सकता है । मिलन घड़ी भर चलाना मुश्किल पड़ जाता है ।
संसार की प्रत्येक वस्तु को पाने के लिए तो हम नहीं ऊबते । लेकिन पाकर ऊब जाते हैं । और परमात्मा की तरह ठीक उलटा नियम लागू होता है । संसार कर तरफ प्रयत्न करने में आदमी नहीं ऊबता । प्राप्ति में ऊबता है । परमात्मा की तरह प्राप्ति में कभी नहीं ऊबता । लेकिन प्रयत्न में बहुत ऊबता है । ठीक उलटा नियम लागू होगा भी । जैसे कि हम झील के किनारे खड़े हों । तो झील में हमारी तस्वीर बनती है । वह उलटी बनेगी । जैसे आप खड़े हैं । आपका सिर ऊपर होंगे । तस्वीर झील में उलटी बनेगी । संसार के किनारे हमारी तस्वीर उलटी बनती है । संसार में जो हमारा प्रोजेक्शन होता है । वह उलटा बनता है । इसलिए संसार में गति करने के जो नियम हैं । परमात्मा में गति करने के वे नियम बिलकुल नहीं हैं । ठीक उनसे उलटे नियम काम आते हैं । मगर यहीं बड़ी मुश्किल हो जाती है । संसार में तो ऊबना आता है बाद में । प्रयत्न में तो ऊब नहीं आती । इसलिए संसार में लोग गति करते चले जाते हैं । परमात्मा में प्रयत्न में ही ऊब आती है । और प्राप्ति तो आएगी बाद में । और प्रयत्न पहले ही उबा देगा । तो आप रुक जाएंगे । कितने लोग नहीं हैं । जो प्रभु की यात्रा शुरू करते हैं । शुरू भर करते हैं । कभी पूरी नहीं कर पाते । कितनी बार आपने तय किया कि रोज प्रार्थना कर लेंगे । फिर कितनी बार छूट गया वह । कितनी बार तय किया कि स्मरण कर लेंगे प्रभु का घड़ी भर । एकाध दिन । 2 दिन । काफी । फिर ऊब गए । फिर छूट गया । कितने संकल्प । कितने निर्णय । धूल होकर पड़े हैं । आपके चारों तरफ । मेरे पास लोग आते हैं । वे कहते हैं कि - ध्यान से कुछ हो सकेगा ? मैं उनको कहता हूं कि जरूर हो सकेगा । लेकिन कर सकोगे ? वे कहते हैं - बहुत कठिन तो नहीं है ? मैं कहता हूं - बहुत कठिन । जरा भी नहीं । कठिनाई सिर्फ 1 है - सातत्य । ध्यान तो बहुत सरल है । लेकिन रोज कर सकोगे ? कितने दिन कर सकोगे ? 3 महीने । लोगों को कहता हूं कि सिर्फ 3 महीने सतत कर लो । मुश्किल से कभी कोई मिलता है । जो 3 महीने भी सतत कर पाता है । ऊब जाता है । 10-5 दिन बाद ऊब जाता है । बड़े आश्चर्य की बात है कि रोज अखबार पढ़कर नहीं ऊबता जिंदगी भर । रोज रेडियो सुनकर नहीं ऊबता जिंदगी भर । रोज फिल्म देखकर नहीं ऊबता जिंदगी भर । रोज वे ही बातें करके नहीं ऊबता जिंदगी भर । ध्यान करके क्यों ऊब जाता है ? आखिर ध्यान में ऐसी क्या कठिनाई है ? कठिनाई 1 ही है कि संसार की यात्रा पर प्रयत्न नहीं उबाता । प्राप्ति उबाती है । और परमात्मा की यात्रा पर प्रयत्न उबाता है । प्राप्ति कभी नहीं उबाती । जो पा लेता है । वह तो फिर कभी नहीं ऊबता । इसलिए बुद्ध को मिला ज्ञान । उसके बाद वे 40 साल जिंदा थे । 40 साल किसी आदमी ने 1 बार उन्हें अपने ज्ञान से ऊबते हुए नहीं देखा । कोहनूर हीरा मिल जाता 40 साल । तो ऊब जाते । संसार का राज्य मिल जाता । तो ऊब जाते । महावीर भी 40 साल जिंदा रहे ज्ञान के बाद । फिर किसी आदमी ने कभी उनके चेहरे पर ऊब की शिकन नहीं देखी । 40 साल जिंदा थे । 40 साल निरंतर उसी ज्ञान में रमे रहे । कभी ऊबे नहीं । कभी चाहा नहीं कि अब कुछ और मिल जाए । नहीं । परमात्मा की यात्रा पर प्राप्ति के बाद कोई ऊब नहीं है । लेकिन प्राप्ति तक पहुंचने के रास्ते पर - अथक । इसलिए कृष्ण कहते हैं । बिना ऊबे श्रम करना कर्तव्य है । करने योग्य है ।
कृष्ण कहते हैं ।  इसलिए धर्म में ट्रस्ट का । भरोसे का 1 कीमती मूल्य है । श्रद्धा का अर्थ होता है - ट्रस्ट । उसका अर्थ होता है - ट्रस्ट । उसका अर्थ होता है । कोई कह रहा है । अगर उसके व्यक्तित्व से वे किरणें दिखाई पड़ती हैं । जो वह कह रहा है । उसका प्रमाण देती है । वह जो कह रहा है । जिस प्राप्ति की बात । वहां खड़ा हुआ मालूम पड़ता है । अर्जुन भलीभांति कृष्ण को जानता है । कृष्ण को भी विचलित नहीं देखा है । कृष्ण को उदास नहीं देखा है । कृष्ण की बांसुरी से कभी दुख का स्वर निकलते नहीं देखा है । कृष्ण सदा ताजे हैं । इसीलिए तो लोग ऐसा सोचते हैं । उन्हें इस मुल्क के चिंतन के ढंग का पता नहीं है । यह मुल्क तस्वीरें शरीरों की नहीं बनाता । मनोभावों की बनाता है । कृष्ण कभी भी बूढ़े नहीं होते । कभी बासे नहीं होते । सदा ताजे हैं । बूढ़े तो होते ही हैं । शरीर तो बूढ़ा होता ही है । शरीर तो जराजीर्ण होगा । मिटेगा । शरीर तो अपने नियम से चलेगा । पर कृष्ण की चेतना अविचलित भाव से आनंदमग्न बनी रहती है । युवा बनी रहती है । वह कृष्ण की चेतना सदा नाचती ही रहती है । कृष्ण की हमने इतनी तस्वीरें देखी हैं । कई दफे शक होने लगता है कि कृष्ण ऐसा 1 पैर पर पैर रखे और बांसुरी पकड़े कितनी देर खड़े रहते होंगे । यह ज्यादा दिन नहीं चल सकता । यह कभी कभी तस्वीर उतरवाने को । फोटोग्राफर आ गया हो । बात अलग है । बाकी ऐसे ही कृष्ण खड़े रहते हैं ? नहीं । ऐसे ही नहीं खड़े रहते हैं । लेकिन यह आंतरिक बिंब है । यह भीतर तस्वीर है । यह खबर देती है कि भीतर 1 नाचती हुई, प्रफुल्ल चेतना है । 1 नृत्य करती हुई चेतना है । जो सदा नाच रही है । भीतर गीत गाता मन है । जो सदा बांसुरी पर स्वर भरे हुए है । यह बांसुरी सदा ऐसी होंठ पर रखे बैठे रहते होंगे ? ऐसा नहीं है । यह बांसुरी तो सिर्फ खबर देती है भीतर की । ये तो प्रतीक हैं । सिंबलिक हैं । ये गोंपियों चारों वक्त । चारों पहर । 24 घंटे । आसपास नाचती रहती होंगी ? ऐसा नहीं है । ऐसा नहीं है कि कृष्ण इसी गोरखधंधे मे लगे रहे । नहीं । ये प्रतीक हैं । बहुत आंतरिक प्रतीक हैं । असल में इस मुल्क की मिथ । इस मुल्क के मिथिक । इस मुल्क के पुराण प्रतीकात्मक हैं । गोपियों से मतलब वस्तुतः स्त्रियों से नहीं है । स्त्रियां भी कभी कृष्ण के आसपास नाची होंगी । कोई भी इतना प्यारा पुरूष पैदा हो जाए । स्त्रियां न नाचे । ऐसा मौका चूकना संभव नहीं है । स्त्रियां नाची होंगी । लेकिन यह प्रतीक कुछ और है । यह प्रतीक गहरा है । यह प्रतीक यह कह रहा है कि जैसे किसी पुरूष के आसपास चारों तरफ सुंदर, प्रेम से भरी हुई, प्रेम करने वाली स्त्रियां नाचती रहें । और वह जैसा प्रफुल्लित रहे । वैसे कृष्ण सदा हैं । वह उनका सदा होना है । वह उनका ढंग है - होने का । जैसे चारों तरफ सौंदर्य नाचता हो । चारों तरफ गीत चलते हों । चारों तरफ संगीत हो । और घुंघरू बजते हों । ऐसे कृष्ण 24 घंटे ऐसी हालत में जीते हैं । ऐसा चारों तरफ उनके हो रहा हो । ऐसे वे भीतर होते हैं । ओशो
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मन और बीमारी का संबंध - अगर आप बीमार पड़े हैं । और आपको पता चला कि डाक्टर ने ऐसा कहा है कि बिलकुल ठीक हैं । कोई खास बीमारी नहीं है । तो तत्काल आपके भीतर बीमारी क्षीण होने का अनुभव आपको हुआ होगा - तत्काल । आपने कभी ख्याल किया है । बीमार पड़े हों बिस्तर पर । सभी कभी न कभी पड़ते हैं । आपने कभी ख्याल किया है कि बीमार पड़े हों । बड़ी तकलीफ मालूम पड़ती है । बड़ी बेचैनी है । बड़ी भारी बीमारी है । डाक्टर आया । डाक्टर के बूट बजे । उसकी शक्ल दिखाई दी । उसका स्टेथकोप । थोड़ी बीमारी एकदम उसको देखकर कम हो गई । अभी उसने दवा नहीं दी है । डाक्टर ने थोड़ा ठकठकाया । इधर उधर ठोंका पीटा । उसने अपना स्पेशलाइजेशन दिखाया कि - हां ! फिर उसने कहा - कोई बात नहीं । बहुत साधारण है । कुछ खास नहीं है । 2 दिन की दवा में ठीक हो जाएंगे । फिर उसने जितनी बड़ी फीस ली । उतना ही अर्थ मालूम पड़ा कि यह बात ठीक होगी ही ।
आपने ख्याल किया है । डाक्टर की दवा । और उसका प्रिस्क्रिप्शन आने में थोड़ी देर लगती है । लेकिन मरीज ठीक होना शुरू हो जाता है । मन ने अपने को सुझाव दिया कि जब इतना बड़ा डाक्टर कहता है । तो ठीक हैं ही । अगर आप बीमार पड़े हैं । और आपको पता चला कि डाक्टर ने ऐसा कहा है कि - बिलकुल ठीक है । कोई खास बीमारी नहीं है । तो तत्काल आपके भीतर बीमारी क्षीण होने का अनुभव आपको हुआ होगा -तत्काल । 1 ताजगी आ गई है । बुखार कम हो गया है । बीमारी ठीक होती मालूम पड़ती है । अभी कोई दवा नहीं दी गई है ? तो यह परिणाम कैसे हुआ है ? पश्चिम में डाक्टर 1 नई दवा पर काम करते हैं । उस दवा को कहते हैं - धोखे की दवा, प्लेसबो । बडे हैरान हुए हैं । 10 मरीज हैं । दसों 1 बीमारी के मरीज हैं । 5 को दवा दी । और 5 को सिर्फ पानी दिया । बड़ी मुश्किल है । दवा वाले भी 3 ठीक हो गए है । पानी वाले भी 3 ठीक हो गए । अब दवा को क्या कहें ? यह दवा थी ही नहीं । यह सिर्फ पानी था । लेकिन दवा वाले भी । 5 में से 3 ठीक हो गए हैं । और ये भी 5 में से 3 ठीक हो गए हैं । पानी वाले । अब क्या कहें ? मनोविज्ञान तो कहता है कि अब तक कि जितनी दवाएं हैं दुनिया में । वे सिर्फ सजेशन का काम करती हैं । असली परिणाम सजेशन का है । सुझाव का है । असली परिणाम दवा के तत्व का नहीं है । इसीलिए तो इतनी पैथी चलती हैं । इतनी पैथी चल सकती हैं ? पागलपन की बात है । बीमारी अगर होगी । तो इतनी पैथी चल सकती हैं वैज्ञानिक अर्थो में ? होम्योपैथी भी चलती है । और होम्योपैथी के नाम पर करीब करीब शक्कर की गोलियां चलती हैं । कम से कम हिंदुस्तान में बनी तो शक्कर की गोली ही होती हैं । शक्कर भी शुद्ध होगी । इसमें संदेह है । बायो केमिस्ट्री चलती है । 8 तरह की दवाओं से सब बीमारियां ठीक हो जाती हैं । नेचरोपैथी चलती है । दवा वगैरह की कोई जरूरत नहीं है । पेट पर पानी की पटटी या मिट्टी की पटटी से बीमार ठीक होते हैं । जंत्र, मंत्र, तंत्र । सब चलता है । जादू टोना चलता है । सब चलता है । क्या, मामला क्या है ? और आदमी सबसे ठीक होता है । आदमी के ठीक होने के ढंग बड़े अजीब हैं । शक इस बात का है कि आदमी की अधिक बीमारियां भी उसके सुझाव होती हैं कि उसने माना है कि वह बीमार हुआ है । और आदमी का अधिकतर स्वास्थ्य भी उसका सुझाव होता है कि उसने माना है कि वह ठीक हुआ है । बीमारियां भी बहुत मायनों में झूठी होती हैं - मन का खेल । लेकिन मन आटो सजेस्टिबल है । अपने को सुझाव दे सकता है ।
उस तरह की शांति झूठी है । जो कुवे की पद्धति से आती है । जो कहती है कि - तुम शांत हो रहे हो । इसको माने चले जाओ । कहे चले जाओ । दोहराए चले जाओ । शांत हो जाओगे । जरूर शांत हो जाएंगे । लेकिन वैसी शांति सिर्फ सतह पर दिया गया धोखा है । वह शांति वैसी है । जैसे नाली के ऊपर हमने फूलों को बिछा दिया हो । तो क्षण भर को धोखा हो जाएं । हां, किसी नेता की पालकी निकलती हो सड़क से । तो काफी है । चलेगा । क्षण भर को धोखा हो जाए । कोई नाली नहीं है । फूल बिछे हैं । लेकिन घड़ी भर बाद फूल कुम्हला जाएंगे । नाली की दुर्गंध फूलों के पार आकर फैलनी लगेगी । थोड़ी देर में नाली फूलों कों डुबा लेगी । झूठी शांति हो सकती है - सुझाव से । सम्मोहन से । और सम्मोहन की हजार तरह की विधियां दुनिया में प्रचलित हैं । जिनसे आदमी अपने को मान ले सकता है कि - मैं शांत हूं । और भी रास्ते हैं । और भी रास्ते हैं । जिनसे आदमी अपने को शांत करने के ख्याल में डाल सकता है । लेकिन उन रास्तों से शांत हुआ आदमी भीतर नहीं जा सकेगा । जबर्दस्ती भी अपने को शांत कर सकते हैं । जबर्दस्ती भी अपने को शांत कर सकते हैं । अगर अपने से लड़े ही चले जाएं । और जबर्दस्ती अपने ऊपर किए चले जाएं सब तरह की । तो अपने को शांत कर सकते हैं । लेकिन वह शांति होगी बस - जबर्दस्ती की शांति । भीतर उबलता हुआ तूफान होगा । भीतर जलती हुई आग होगी । ठीक ज्वालामुखी भीतर उबलता रहेगा । और ऊपर सब शांत मालूम पड़ेगा ।
ऐसे शांत बहुत लोग हैं । जो ऊपर से शांत दिखाई पड़ते हैं । लेकिन इनके भीतर बहुत ज्वालामुखी है । उबलते रहते हैं । हां, ऊपर से उन्होंने 1 व्यवस्था कर ली है । जबर्दस्ती की 1 डिसिप्लिन । 1 आउटर डिसिप्लिन । 1 बाहृय अनुशासन अपने ऊपर थोप लिया है । ठीक समय पर सोकर उठते हैं । ठीक भोजन लेते हैं । ठीक बात जो बोलनी चाहिए । बोलते हैं । ठीक शब्द जो पढ़ने चाहिए । पढ़ते हैं । ठीक समय सो जाते हैं । जिस प्रभाव में उनको जीना है । शांति में जीना । उसका धुआं अपने चारों तरफ पैदा रखते हैं । तो फिर 1-1क सतह ऊपर की पर्त शांत दिखाई पड़ने लगती है । और भीतर सब अशांत बना रहता है । ओशो
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