17 अप्रैल 2011

आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ 14

उभय भारती  कहती हैं -  हे यतिन्द्र ! मैं आपके अभिप्राय को समझती हूँ । मैंने इस भावी घटना को अपने बचपन काल में ही 1 तपस्वी के द्वारा जान लिया था । 1 समय मैं अपनी माता के पास बैठी थी । तब 1 कान्तिमान तपस्वी वहाँ पर आये । माता ने उनका आतिथ्य कर लेने पर उनसे पूछा - हे त्रिकालज्ञ महात्मन ! मैं इस पुत्री के भाग्य के विषय में कुछ पूछना चाहती हूँ । इसकी आयुष्य कितनी होगी ? कितने पुत्रों तथा कैसे पति को यह प्राप्त करेगी ? धन धान्य सम्पन्न होकर यह कितने यज्ञ करेगी ? क्षण भर आँखे मूंदकर उन तपस्वी ने कहा - हे देवी ! भूतल पर वैदिक मार्ग के उच्छिन्न हो जाने पर स्वयं ब्रह्मदेव { ब्रह्मा } वेद मार्ग के उद्धार के लिए मण्डन पण्डित के रूप में अवतरित होंगे । जिस प्रकार पार्वती ने शंकर की, लक्ष्मी ने विष्णु को प्राप्त किया । उसी प्रकार तुम्हारी कन्या भी अपने अनुरूप मण्डन को पति रूप में पाकर समस्त यज्ञों को करेगी । और पुत्रों के साथ बहुत दिनों तक प्रसन्न रहेगी । अनन्तर इस लोक में दुष्ट मतों द्वारा नष्ट हुए उपनिषद सिद्धांत को स्थिर करने के लिए स्वयं आदि देव  महादेव नर रूप लेकर अपने चरणों से इस भूतल को अलंकृत करेंगे । उस यति वेषधारी शंकर के साथ तुम्हारी कन्या के पति का शास्त्रार्थ होगा ।  जिसमें इसका पति परास्त होकर गृहस्थाश्रम का त्याग कर संसार को शरण देने वाले उन यति की शरण में जायेगा ।
इतना कहकर वे तपस्वी चले गये । हे विद्वन ! वे सभी वचन उनके सत्य हुए हैं । तो यह वचन कैसे मिथ्या होगा ? परन्तु हे विद्वन ! अब तक तुमने पण्डितों में श्रेष्ठ मेरे पति को पूरी तरह से नहीं जीता है । क्योंकि मैं उनकी अर्धांगिनी हूँ । और उसे तुमने अभी तक नहीं जीता है । इसलिए मुझे जीतकर आप इन्हें अपना शिष्य बनाइये । यद्यपि तुम इस जगत के मूल कारण हो । सर्ववेत्ता परम पुरुष हो । फिर भी तुम्हारे साथ शास्त्रार्थ करने के लिए मेरा मन उत्कुण्ठित हो रहा है । 
शंकर स्वामी - यह तुम्हारा वचन अनुचित है ।  क्योंकि यशस्वी पुरुष महिला के साथ वाद विवाद नहीं करते ।
उभय भारती - हे भगवन ! अपने मत का खण्डन करने के लिए जो चेष्टा करता हो । चाहे वह स्त्री हो या पुरुष । उसके जीतने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिए । यदि अपने पक्ष की रक्षा करना अभीष्ट हो । इसलिए गार्गी { गार्गी ऋषि वचक्नु की कन्या थी । इसलिए उसका नाम गार्गी हुआ था { महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 320 } के साथ महर्षि याज्ञवल्क्य ने शास्त्रार्थ किया । तथा सुलभा ने धर्मध्वज नाम वाले राजा जनक के साथ वाद विवाद किया । क्या स्त्री से शास्त्रार्थ करने पर भी वे यशस्वी न हुए ?
नारायण ! इसलिए युक्ति युक्त उभय भारती के वचनों को सुनकर श्रुति रूपी नदियों से पूर्ण समुद्र के समान आचार्य सर्वज्ञ शंकर देशिक ने सरस्वती  उभय भारती  के साथ शास्त्रार्थ करना स्वीकार किया ।
शंकर स्वामी तथा उभय भारती का शास्त्रार्थ
एक दूसरे को जीतने के लिए उत्सुक शंकर और सरस्वती में वह शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ । जिसमें बुद्धि की चतुरता से शब्द की झड़ी लग रही थी । इन दोनों के विचित्र पद विन्यास और युक्तियों से भरे कथनों को सुनकर लोगों ने न तो शेषनाग को ही कुछ गिना । न सूर्य को । न बृहस्पति को । न शुक्राचार्य को । संसार में दूसरों की तो बात ही क्या है ।
सन्ध्या वन्दन आदि में निश्चित काल को छोड़कर । न दिन में । और न रात में ही यह शास्त्रार्थ रुका । इस प्रकार शास्त्रार्थ करते इन दोनों विशिष्ट विद्वानों में 17 दिवस बीत गये ।
शारदा ने अनादि सिद्ध समस्त वेदों और समस्त शास्त्रों मे यतिन्द शंकर को अज्ञेय समझकर अपने मन में झट से विचार किया । अत्यन्त बाल्यावस्था में ही इन्होंने सन्यास ग्रहण किया है । श्रेष्ठ नियमों से कभी हीन नहीं हुए हैं । अतः कामशास्त्र में इनकी बुद्धि प्रवेश नहीं कर सकती । इसलिये मैं इसी शास्त्र के द्वारा इन्हें जीतूँगी ।
उभय भारती कहती हैं - काम की कलाएँ कितनी है ? उनका स्वरूप कैसा है ? किस स्थान पर वे निवास करती है ? शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष उनकी स्थिति कहाँ कहाँ रहती है ? युवती में तथा पुरुष में इन कलाओं का निवास किस प्रकार से है ?
इस प्रकार बहुत विचार करने पर भी यति शंकर कुछ नहीं बोले । क्योंकि उन कलाओं के विषय में कुछ न कहूँ । तो अल्पज्ञ बनता हूँ । यदि उत्तर देता हूँ । तो मेरा यति धर्म का नाश होता है ।
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