19 अप्रैल 2011

आचार्य शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ 10

आचार्य शंकर देशिक कहते हैं - व्यवहार सिद्ध भेद का प्रतिपादन करती हुई यह श्रुति अभेद प्रतिपादक पर श्रुति का बाध नहीं करती । सच तो यह है कि तत्वमसि यह अभेद श्रुति अपूर्व अर्थ { जीव ब्रह्म की एकता जो लोक में प्रसिद्ध है } का बोध कराती है । इसलिये वह अधिक बलवती है । इस एकत्व प्रतिपादक बलवती श्रुति से भेद श्रुति बाधित है । ऋतं पिबन्तौ इस श्रुति का भेद वर्णन करने में तात्पर्य नहीं है । क्योँकि भेद तो विना श्रुति की सहायता के भी लोक में प्रसिद्ध है । श्रुति का तात्पर्य तो अपूर्व अर्थ के प्रतिपादन में है । इसलिये आपके द्वारा उद्धृत ऋतं पिबन्तौ यह श्रुति भेद बोधक नहीं है । किन्तु लोक सिद्ध भेद का केवल अनुवाद मात्र है ।
मण्डन कहते हैं - हे यतिवर्य ! हमारी बुद्धि में अभेद श्रुति से भेद
बोधक श्रुति अधिक बलवती है । क्योंकि { मैं ईश्वर नहीं हूँ } इस प्रकार प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी उसकी पुष्टि करते हैं । इसलिए भेद श्रुति प्रत्यक्षादि प्रमाण से बाधित अर्थ को कहने वाली अभेद श्रुति की बाधिका है ।
शंकर स्वामी कहते हैं - हे पण्डितवर्य ! श्रुतियों में बलवत्ता किसी अन्य प्रमाण से संपादित नहीं है । अन्यथा उन प्रमाणों से गतार्थ हो जाने के कारण श्रुतियों में दुर्बलता ही संपादित होगी । अर्थात अपनी प्रमाणता या बलवत्ता में अन्य प्रमाण की सहायता लेने का अर्थ तो यह है कि श्रुति को दुर्बल बनाना । या परतः प्रमाण मानना । जबकि वेद स्वतः प्रमाण माने गये हैं । वेदों का तात्पर्य लोक प्रसिद्ध अर्थ { भेद } के प्रतिपादन करने में नहीं है । क्योंकि वह तो लोक प्रसिद्ध है । प्रत्युत अज्ञात अर्थ { जीव ब्रह्म की एकता } के प्रतिपादन करने में तात्पर्य है । जो लोक प्रसिद्ध नहीं है । इस प्रकार भेद श्रुति से अभेद श्रुति प्रबल है । अतः जीव ब्रह्म की एकता मानना ही ठीक है ।
तैत्तिरीय श्रुति के आधार पर शास्त्रार्थ ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन ।
सोऽश्नुते सर्वान्कामान सह ब्रह्मणा विपश्चितेति । तैत्तिरीय 2/1
मण्डन मिश्र कहते हैं - जो सत चिद आनन्द स्वरूप ब्रह्म को परम
आकाश अर्थात हृदय के अन्दर गुफा में स्थित जानता है । वह सर्वत्र ब्रह्मा के साथ सब कामनाओं को भोगता है । इस श्रुति से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि मुक्ति में जीव और ब्रह्म अलग अलग रहते हैं । अतः भेद सत्य है ।
आचार्यपाद कहते हैं - इसका यह अर्थ नहीं है कि ब्रह्मा के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है । किन्तु इसका अभिप्राय है यह है कि अविद्या कृत आवरण दूर होने से ब्रह्म स्वरूप होकर वह एक साथ उन सभी कामनाओं को भोगता है । जो प्रथम ही उसके अन्दर विद्यमान
थीं । परन्तु अविद्या के कारण अविद्यामान सी थीं ।
विश्वरूपाचार्य मण्डन कहते है - आ मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । बृहदारण्यक श्रुति 2/4/1
याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी ! आत्मा द्रष्टव्य है । अतः उसका श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन करना चाहिये । इस श्रुति में जीव को साक्षात करने वाला । तथा परमात्मा का साक्षात करने के योग्य बतलाया गया है । इसलिये दोनों का भेद सत्य है ।
शंकर स्वामी कहते हैं - यहाँ भी व्यवहार सिद्ध भेद को लेकर कर्म और कर्ता का प्रतिपादक है । अन्यथा अभेद बोधक श्रुतियों के साथ विरोध होगा । क्योंकि श्रुतियों का सही तात्पर्य अभेद अर्थात एकत्व में है । इसलिए यहाँ भी लोक सिद्ध भेद का अनुवाद मात्र है ।
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